प्रकृति के पांच तत्व—पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—आयुर्वेद में जीवन के आधार स्तंभ हैं। ये ही शरीर को संचालित करने वाले त्रिदोष वात-पित्त-कफ का निर्माण करते हैं। मानव देह को विश्व का प्रतिबिंब मानकर आयुर्वेद ने रोगनिवारण का विज्ञान रचा है।
वातदोष वायु-अनिल से प्रेरित, संचरण और चेतना का कारक है। दोष से शुष्कता, कंपन, चिंता और पाचन विकार होते हैं। पित्तदोष अग्नि-जल संमिश्रण से पाचनाग्नि, दृष्टि और वीर्य नियंत्रित करता है; असंतुलन में ज्वर, विद्रधि और मतिमंदता आती है। कफदोष पृथ्वी-जल से बल, स्निग्धता और धृति देता है, परंतु अधिकता से प्रमेह, अलस्य और अवसाद छा जाता है।
स्वास्थ्य तभी है जब दोष संतुलित हों। प्रकृति परीक्षण से व्यक्ति का मूल दोष जाना जाता है, जिसके अनुरूप स्वस्थवृत्त अपनाएं। वातरोगी तेलमर्दन और मधुर भोजन से लाभान्वित; पित्ती ठंडे जल, दही से शांत; कफ वाले व्यायाम, तिक्त रस से स्फूर्तिवान।
दिनचर्या-ऋतुचर्या का महत्व अपार—हेमंत में स्निग्ध भोजन, शरद में शीतल फल, वसंत में लघु आहार। पंचकर्म, हर्बल चिकित्सा और सात्विक जीवन से त्रिदोष साम्य रहता है।
आज के तनावपूर्ण युग में आयुर्वेद का यह ज्ञान अमूल्य है। पंच महाभूत संतुलन से त्रिदोष नृत्य कराएं, निरोगी काया पाएं।