नेपाल के चुनावी नतीजों ने नई दिल्ली-काठमांडू धुरी को मजबूत करने का मार्ग प्रशस्त किया है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) सत्ता की दहलीज पर खड़ी है, जो खराब हो चुके द्विपक्षीय रिश्तों को पटरी पर ला सकती है।
राजनीतिक उथल-पुथल से त्रस्त नेपाल में बालेंद्र शाह की अगुवाई वाली आरएसपी मजबूत जनादेश के साथ आगे बढ़ रही है। चीन समर्थक पूर्व पीएम ओली के रुख से अलग, यह पार्टी संतुलित विदेश नीति पर जोर दे रही है।
दोनों देशों के रिश्ते ऐतिहासिक हैं। खुली सीमा से करोड़ों लोग आवागमन करते हैं। भारत से 8.6 अरब डॉलर का व्यापार नेपाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। सांस्कृतिक समानताएं भी बंधन मजबूत करती हैं।
सीमा झगड़े, बीआरआई परियोजनाएं और हस्तक्षेप के आरोपों ने दरार डाली। झापा जिले का चीनी प्रोजेक्ट भारत के लिए संवेदनशील था, लेकिन आरएसपी ने इसे नजरअंदाज कर दिया। इसके बजाय रुपये एक्सचेंज रेट की समीक्षा का वादा किया।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने चुनाव सहयोग का उल्लेख कर बधाई दी और नई सरकार से अपेक्षाएं जताईं। शाह का ‘ग्रेटर नेपाल’ नक्शा और सिया पर बयान विवादास्पद रहे, लेकिन वे नेपाल हितों को सर्वोपरि मानते हैं।
एक दल की सरकार बनना ऐतिहासिक होगा। आर्थिक चुनौतियों से निपटने में भारत प्रमुख भूमिका निभा सकता है। यह अवसर संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है।