कल्पना कीजिए – स्टॉकहोम की चहल-पहल भरी शाम, कोई सुरक्षा नहीं, बस पत्नी का साथ। यही थी ओलोफ पाल्मे की जिंदगी। लेकिन 1986 की एक फरवरी रात ने उनके इस विश्वास को चुनौती दे दी। सिनेमा से लौटते वक्त गोली चली, और स्वीडन का लोकप्रिय नेता हमेशा के लिए चला गया।
साढ़े ग्यारह बजे ग्रैंड सिनेमा के बाहर से शुरू हुआ सफर, स्वावेगन पर खत्म। बिना गार्ड के चलने वाले पाल्मे को करीब से गोली मार दी गई। पत्नी लिस्बेथ को भी चोट लगी, लेकिन वे जिंदा रहीं। यह घटना स्वीडन की ‘ट्रस्ट सोसाइटी’ को झकझोर गई।
पाल्मे सामाजिक लोकतंत्र के प्रतीक थे। दो कार्यकाल में उन्होंने अमेरिका की वियतनाम नीति की आलोचना की, अपार्थीड के खिलाफ आवाज बुलंद की। उनकी बेबाकी ने वैश्विक पहचान दिलाई, दुश्मनी भी।
देश शोकाकुल हो गया। लाखों ने अंतिम यात्रा में हिस्सा लिया। जांच में सैकड़ों संदिग्ध, लेकिन फैसला नहीं। पेटरसन का केस उलझा। आखिर 2020 में ‘स्कैंडिया मैन’ स्टिग एंगस्ट्रॉम पर उंगली उठी। घटना के गवाह, संदिग्ध बयान – सब कुछ फिट बैठता था, मगर देरी से। वह तो 2000 में गुजर चुका था।
पाल्मे की मौत ने स्वीडन को सबक सिखाया। अब नेता गार्डेड घूमते हैं। लेकिन उनकी सादगी और सिद्धांत आज भी प्रेरणा देते हैं। यह कहानी है विश्वास और खतरे के बीच की जंग की।