बांग्लादेश के 13वें आम चुनाव परिणामों ने जमात-ए-इस्लामी को वोट प्रतिशत में दूसरा स्थान दिया, मगर संसद में उसकी उपस्थिति नाममात्र की रही। इसका कारण केवल रणनीतिक गलतियां नहीं, बल्कि दशकों पुराना विवादास्पद रिकॉर्ड है जो राजनीतिक स्वीकार्यता छीन लेता है।
संस्थापक मौलाना मौदूदी ने इस्लामी राज्य की कल्पना के साथ पार्टी बनाई। पाकिस्तान पहुंचकर इसने राजनीति के साथ हिंसा को अपनाया। छात्र इकाई ने कैंपसों को रणभूमि बना दिया—चुनावी धांधली, विरोधियों का अपहरण और खूनी संघर्ष इसके हथियार बने।
पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली आंदोलन के समय जमात ने इस्लामाबाद का साथ चुना, स्वतंत्रता संग्राम में दुश्मन बने। युद्ध अपराधों के आरोपों ने स्थायी दाग लगाया। बांग्लादेश ने इसे बार-बार बैन किया, नेताओं को फांसी दी।
वर्तमान में सुधार का दावा करने वाली पार्टी की कट्टरता ग्रामीण-शहरी मतदाताओं से टकराती है। सत्ताधारी लीग के खिलाफ विरोधी वोट बंटे, लेकिन गठबंधन टूटे। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—इतिहास से समझौता, लोकतांत्रिक बदलाव और सामाजिक समावेश के बिना सफलता असंभव। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी इसकी छवि संदिग्ध बनी हुई है।