इस्लामाबाद। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि अफगानिस्तान में उनका देश ‘भाड़े के सिपाहियों’ की भांति सक्रिय रहा। राजधानी में हुए आत्मघाती धमाके के बाद असेंबली में दिया यह बयान पाकिस्तानी अफगान रणनीति की पोल खोलता है।
आसिफ ने 22-23 वर्षों की अफगान उपस्थिति को अमेरिकी समर्थन के लोभ में पश्चिमी एजेंडे की पूर्ति बताया, धार्मिक कर्तव्य से कोसों दूर। उन्होंने चेतावनी दी कि पुरानी भूलें अब भी दोहराई जा रही हैं। यह बयान पाकिस्तान के सुरक्षा खतरे के बीच आंतरिक नीति पुनरावलोकन को प्रतिबिंबित करता है।
अफगान डायस्पोरा और टोलो न्यूज के उल्लेख से पाकिस्तानी गृह मंत्रालय के नए आरोप सामने आ रहे हैं, जो अतीत के हस्तक्षेपों से वर्तमान संकट के तार जोड़ते हैं। पूर्व राजदूत अजीज मारेक ने इसे पाक अधिकारियों को क्लीन चिट देने का हथकंडा कहा, आर्थिक फायदे को असली वजह ठहराया।
बयान में अफगानिस्तान पर नाराजगी प्रमुख है—पहले पाक चिंताओं को मानने वाला काबुल अब आतंकवाद विरोधी वादों से कतराता है। तालिबान सत्ता में आने से सीमा सुरक्षा की पाकिस्तानी आशा चूर-चूर हो गई।
जर्मनी के हाइडलबर्ग के छात्र काजिम जाफरी ने इसे नीति विफलता का सर्वोच्च इकबाल बताया, जो आंतरिक टकराव दिखाता है। ‘अफगानिस्तान के लिए यह स्पष्ट किंतु भयभीत करने वाला है—पाक आत्मचिंतन के साथ काबुल पर जिम्मेदारी थोप रहा है।’
मिलिटेंसी बढ़ने के दौर में आसिफ का बयान बदलाव की बुनियाद रख सकता है। दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों पर इसका असर गहरा होगा, जहां जवाबदेही और कूटनीति की परीक्षा होगी।