पाकिस्तान का भ्रष्टाचार नैतिक मुद्दा नहीं, बल्कि गहरी संरचनात्मक और आर्थिक समस्या है, यह निष्कर्ष एक विस्तृत रिपोर्ट में निकला है। तुलनात्मक विश्लेषण से पता चलता है कि यह परियोजना खर्च बढ़ाता है, टेंडर प्रक्रिया बिगाड़ता है और योजनाओं को कमजोर बनाता है।
बड़े प्रोजेक्ट्स में यह विपदा और गंभीर हो जाती है, जहां भारी फंडिंग, उलझे अनुबंध और निगरानी की कमी भ्रष्टाचार को आमंत्रित करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संस्थागत ढांचे का स्वाभाविक परिणाम है।
खरीद नीतियां, लेखा परीक्षा और नियामक निकाय राजनीतिक अर्थतंत्र में फंसे हैं, जहां कुलीन वर्ग के सौदे और आंशिक प्रवर्तन राज करते हैं। जवाबदेही कानून से ऊपर उठकर राजनीति पर टिकी रहती है।
परिणामस्वरूप निवेशक सतर्क हो जाते हैं। पाकिस्तान की प्रमुख परियोजनाओं में अतिरिक्त लागत, देरी और बदलाव कानूनी स्थिरता पर भरोसा डगमगाते हैं। ऋणदाता संस्थाएं राज्य दायित्वों में वृद्धि की ओर इशारा करती हैं।
आर्थिक अस्थिरता से जूझते पाकिस्तान में यह कर्ज दरें ऊंची करता है, पूंजी प्रवाह रोकता है। करदाताओं पर बोझ पड़ता है, सामाजिक कल्याण प्रभावित होता है।
जब अनियमितताएं शासन का आधार बनती हैं, तो अवसंरचना विकास के बजाय संकट का कारण बनती है। अंतरराष्ट्रीय भागीदार अनिश्चितता से दूर भागते हैं। मजबूत सुधारों से ही राहत संभव है।