प्योंगयांग से 10 फरवरी 2005 को आई खबर ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर भूकंप ला दिया। डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया ने स्वीकार किया कि उसके पास परमाणु बम हैं। इस घोषणा ने शीत युद्धोत्तर व्यवस्था को चुनौती दी।
छह देशों की वार्ता के बीच यह बयान आया, जो प्रायद्वीप को परमाणु मुक्त बनाने पर केंद्रित थी। उत्तर कोरिया ने खुद को परमाणु राष्ट्र घोषित कर वार्ताओं को पटरी से उतार दिया।
वाशिंगटन ने इसे खतरे की घंटी माना, जापान-साउथ कोरिया ने सतर्कता बढ़ाई। चीन ने बातचीत का रास्ता अपनाया, रूस ने संतुलन की बात की।
घरेलू मोर्चे पर किम जोंग-इल ने इसे विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ ढाल बताया।
परिणामस्वरूप परीक्षणों व मिसाइल उड़ानों की श्रृंखला चली। यह घटना आज भी कूटनीति की दिशा निर्धारित कर रही है।