माइक्रोफाइनेंस के जरिए महिलाओं को सशक्त बनाने वाले मुहम्मद यूनुस की बांग्लादेश अंतरिम सरकार महिलाओं के राजनीतिक सफर को सुरक्षित करने में नाकाम साबित हुई। गुरुवार की रिपोर्ट ने इस विफलता पर सवाल उठाए हैं। सुधार एजेंडे के बावजूद, निर्णय प्रक्रियाओं में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ाने या बचाने के कोई पुख्ता उपाय नहीं हुए।
दलों की आंतरिक व्यवस्था उन्हें रोक रही है, और सरकार की चुप्पी से स्थिति और बिगड़ सकती है। द डेली स्टार की पड़ताल बताती है कि नामांकन प्रक्रिया खत्म होने पर सामान्य सीटों में महिलाओं की भागीदारी चार प्रतिशत के आसपास सिमटी, दो निर्वाचन क्षेत्रों को छोड़कर। 30 दलों में से किसी ने महिला प्रत्याशी पर दांव नहीं लगाया।
यह संरचनात्मक समस्या है, जहां महिलाओं को विकास के लिए तैयार किया गया, लेकिन सियासत के लिए नहीं। प्रथम आलो के आंकड़ों से साफ है कि राष्ट्रीय सहमति आयोग के पांच प्रतिशत कोटा सुझाव को नजरअंदाज किया गया। बीएनपी का आंकड़ा 3.5 प्रतिशत रहा, जमात ने एक भी नहीं उतारा। छोटे दल पीछे हटे।
पूर्व अधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने दलों को झूठे वादों का दोषी ठहराया। बांग्लादेश के चुनावी इतिहास में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व अब भी चुनौती है। 12 फरवरी के मतदान से पहले सरकार को कदम उठाने होंगे, वरना लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ सकती है।