पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली लड़कियों के लिए प्राथमिक स्तर के बाद विफल हो रही है, जो सरकारी उदासीनता को उजागर करती है। नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि कक्षा 5 के बाद ‘अदृश्य दीवार’ बन जाती है। दूर के स्कूल, खतरनाक सफर, ज्यादातर पुरुष स्टाफ और रूढ़िगत सोच के चलते लड़कियां हतोत्साहित हो जाती हैं। बाढ़-तूफान और गरीबी झेलते हुए भी वे स्कूल पहुंचती हैं, लेकिन व्यवस्था आधे रास्ते में उन्हें त्याग देती है।
मलाला फंड की निशात रियाज ने अखबार में तीखा प्रहार किया- लड़कियों में पढ़ने की तलब है, कमी सिस्टम की है। हम भवनों के उद्घाटन, किताबें थामे तस्वीरें और मीडिया कवरेज में व्यस्त रहते हैं, लेकिन किशोर लड़कियां कक्षाओं से ओझल हो जाती हैं। आगामी रिपोर्ट प्राइमरी प्रगति के बाद चिंताजनक गिरावट दिखाएगी। ड्रॉपआउट नहीं, उन्हें निकाला जा रहा।
शिक्षकों की कमी आंशिक समस्या; असल चुनौती निरंतरता है। मिडिल स्कूल दुर्लभ, दूरी खतरे, देखभाल के बोझ, परंपराओं और दरिद्रता से बढ़ जाती है। बिना सुरक्षित सवारी या आसपास स्कूल के, शिक्षा का वादा बचपन में ही टूट जाता।
बेसिक पढ़ाई से सिर्फ आज्ञाकारिता आती है, नेतृत्व नहीं। माध्यमिक पूरी करने वाली लड़की के पास चुनाव होते हैं। स्थिति खराब हो रही- आधी आबादी को उपेक्षित करना देश को पीछे धकेलता है। सार्थक बदलाव चाहिए: ज्यादा स्कूल, महिला टीचर, सुरक्षित ट्रांसपोर्ट और जागरूकता। यही सच्ची प्रगति का रास्ता है।