सांस्कृतिक न्याय की बड़ी जीत! स्मिथसोनियन के नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट तमिलनाडु से लूटी गई तीन प्राचीन कांस्य प्रतिमाएं भारत को लौटा रहा है। चोलकालीन शिव नटराज (990 ईस्वी), सोमस्कंद (12वीं सदी) और विजयनगर संत सुंदरर परावई (16वीं सदी) वाली ये मूर्तियां दक्षिण भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियां हैं।
मंदिरों में विग्रह के रूप में पूजी जाने वाली ये प्रतिमाएं 1950 के दशक में चोरी हुईं। पांडिचेरी फ्रेंच इंस्टीट्यूट के अभिलेखों और एएसआई की जांच ने यह साबित किया। दो मूर्तियां पूर्ण रूप से लौटेंगी, शिव नटराज लॉन्ग-टर्म लोन पर प्रदर्शित रहेगी।
‘द आर्ट ऑफ नॉइंग’ प्रदर्शनी में इसकी पूरी परिक्रमा—मंदिर से चोरी, अवैध बिक्री तक वापसी—प्रदर्शित होगी। निदेशक चेज रॉबिन्सन ने पारदर्शिता पर जोर देते हुए भारत का धन्यवाद किया।
प्रक्रिया में दूतावास, क्यूरेटर और शोधकर्ताओं ने योगदान दिया। नटराज तिरुतुराइपुंडी मंदिर (1957 फोटो) से आई, न्यूयॉर्क गैलरी के फर्जीवाड़े से खरीदी गई। सोमस्कंद अलत्तूर विश्वनाथ मंदिर (1959), सुंदरर वीरसोलापुरम शिव मंदिर (1956) से।
सैकलर दान से ये संग्रह में आईं। गहन प्रोवेनेंस रिसर्च ने सच्चाई उजागर की। भारत की लगातार मांग ने सफलता दिलाई। यह कदम संग्रहालयों की नैतिकता को मजबूत करेगा।