पाकिस्तान में ब्लास्फेमी कानूनों का नया रूप उभर रहा है—डिजिटल दुनिया के फर्जी सबूतों पर आधारित आरोप, जो मौत की सजाओं तक पहुंचा रहे हैं। अधिकार संगठन इसे खतरनाक ‘ईशनिंदा उद्योग’ करार दे रहे हैं, जिसमें हेरफेर किए वीडियो, स्क्रीनशॉट और झूठे बयान निर्दोषों को फंसाते हैं।
दिसंबर में लाहौर हाईकोर्ट रावलपिंडी ने डिजिटल ईशनिंदा के एक केस में छह मुलजिमों को रिहा किया। पहले इन्हें फांसी या आजीवन कारावास मिल चुका था, लेकिन अदालत ने अभियोजन की कमजोर कड़ी पर सवाल उठाए। फैसले में डिजिटल सबूतों के दुरुपयोग पर चेतावनी दी गई।
गरीब और अल्पसंख्यक समुदाय सबसे ज्यादा शिकार। दलाल समझौते के नाम पर फिरौती वसूलते हैं। धारा 295-सी का सख्त प्रावधान मात्र शक पर हिंसा भड़काता है। आंकड़े बताते हैं—तीन दशकों में 104 न्यायबाहरी हत्याएं।
टीएलपी जैसे कट्टरपंथी ऑनलाइन अभियान चलाते हैं, एफआईए बिना जांच के एक्शन लेती है। शगुफ्ता किरण चार बच्चों की विधवा ईसाई महिला—व्हाट्सएप संदेश फॉरवर्ड पर 2021 से जेल, 2024 में फांसी। अपील लंबित है।
यह सिलसिला राज्य तंत्र की नाकामी दिखाता है। ईशनिंदा अब बदले, उगाही का हथियार। हिंदू, ईसाई आदि को सुरक्षा के लिए कानूनों में बदलाव अनिवार्य।