बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार पर पत्रकारों को कुचलने के लिए आतंकवाद-निरोधक कानूनों का गैरकानूनी प्रयोग करने के आरोप लगे हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2025 के दिसंबर तक कुल 640 पत्रकारों को मुकदमों, वित्तीय दबाव और मारपीट से लक्षित किया गया। गिरफ्तारियों की खुली छूट ने कई को बिना सुनवाई के लंबे समय जेल में डाल दिया, उन पर हत्या जैसे अवास्तविक आरोप ठोंके गए।
उदाहरण स्वरूप, ढाका के अनीस आलमगीर की 14 दिसंबर को सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर गिरफ्तारी हुई, जो अब आतंकी धाराओं में फंस चुकी है। मोंजुरुल आलम पन्ना को 28 अगस्त को एक वैध संवैधानिक चर्चा के लिए समान सजा मिली।
प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने खारिज किया कि आलोचना से मुकदमे नहीं हुए, पत्रकारों को पूर्ण स्वतंत्रता का दावा किया। हालांकि, विश्लेषक इसे कानूनी दमन का रूप बताते हैं, जो प्रत्यक्ष सेंसरशिप से अलग अदालती और पुलिस तंत्र से संचालित होता है।
कानून में बिना वारंट हिरासत, लंबी कस्टडी पूछताछ और आजीवन सजा का प्रावधान है। ‘आतंक’ की अस्पष्ट व्याख्या जनभय या प्रशासनिक अवरोध को शामिल कर लेती है।
स्थानीय मीडिया हाउस में भय व्याप्त है। एक प्रमुख संपादक ने गुमनामी में बताया कि आलोचना से भय लगता है, कई खुद को रोक रहे हैं। दिसंबर में उग्र भीड़ ने डेली स्टार व प्रथम आलो के कार्यालय जला डाले, उन्हें भारत-हसीना समर्थक करार देकर।
यह घटनाक्रम प्रेस फ्रीडम को खत्म कर रहा है। सुधार जरूरी हैं वरना बांग्लादेश की छवि और स्थिरता पर बट्टा लगेगा।