ऑस्ट्रेलियाई विश्लेषण में बांग्लादेश के बदलते परिदृश्य पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शेख हसीना के शासनकाल के बाद ‘तौहीदी जनता’ का पुनरागमन नैतिक पुलिसिंग की नई शक्ल ले रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह कोर्सिव पॉपुलिज्म का रूप है जो संस्थाओं की कमजोरी का फायदा उठा रहा है।
हसीना सरकार ने इस्लामी समूहों पर कड़ा नियंत्रण रखा—चुनाव, सुरक्षा बलों और राज्य प्रायोजित राष्ट्रवाद से। राजनीतिक इस्लाम को बांधा गया, लेकिन यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। सत्ता परिवर्तन के बाद यह खुले में आ गया।
तौहीदी जनता बिना औपचारिक संरचना के सक्रिय है। इसके समर्थक सार्वजनिक स्थानों पर हस्तक्षेप करते हैं, व्यवहार सुधारने का दावा करते हुए सांस्कृतिक गतिविधियों में बाधा डालते हैं। महिलाओं से जुड़े कार्यक्रमों पर विशेष निशाना। इसकी अस्पष्ट प्रकृति इसे मजबूत बनाती है—भीड़ और नैतिक दबाव से प्रभाव डालना।
हिंसा की घटनाएं भी बढ़ी हैं, जो खतरे का संकेत हैं। यह आंदोलन धार्मिक कर्तव्य का हवाला देकर ‘अइस्लामी’ प्रथाओं पर हमला करता है। बांग्लादेशी समाज के लिए यह चुनौतीपूर्ण है।
अभी समय है कि कानून मजबूत हो, राजनीतिक वैधता बहाल हो। वरना यह आंदोलन स्थायी रूप धारण कर सकता है, जो बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष छवि को धूमिल कर देगा।