पाकिस्तान का आत्मनिर्णय का नारा उसके अधीन कश्मीरी इलाकों में व्याप्त दमन की सच्चाई को ढंकने का प्रयास है, ऐसा कहती है एक नई रिपोर्ट। ढाका से जारी यह विश्लेषण गुरुवार को सामने आया, जो जोर देता है कि सच्ची स्वतंत्रता जीवन की गुणवत्ता व लोक भागीदारी में नजर आती है।
5 जनवरी को ‘आत्मनिर्णय दिवस’ पर पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर दांव पर लगाता है। यूरेशिया रिव्यू की रिपोर्ट पीओके व गिलगित-बाल्टिस्तान की पोल खोलती है—जहां संघीय सरकार का राज चलता है।
स्थानीय नेता नाममात्र के, आजादी के हामी कुचले जाते, प्रेस पर लगाम, संवैधानिक बंधन स्वायत्तता रोकते। विकास ठहरा, जनता परेशान।
भारत के जम्मू-कश्मीर में 2019 से बदलाव आया। आधारभूत संरचनाओं पर निवेश—सहूलियतपूर्ण यात्रा, बिजली आपूर्ति, चिकित्सा व शिक्षा उन्नत। पर्यटन ने अर्थव्यवस्था को पंख दिए, नौकरियां सृजित।
लाभ सीधे खाते में, संपत्ति कानूनों से महिलाएं सशक्त, पंचायत चुनावों से शासन मजबूत। आंकड़े बयां करते—लोग शांति व समृद्धि के पक्षधर।
पाकिस्तान विरोधाभासी—अंतरराष्ट्रीय नजरें भारत पर, अपनी कमियां छिपाईं। हक उल्लंघन का रोना, पीओके में दमन जारी। मिलिट्री की आलोचना, किंतु सशस्त्र गुट पाल रखे।
भारत का अटूट अंग जम्मू-कश्मीर संविधान, लोकतंत्र व प्रगति से लैस। मतदान, व्यापार व पर्यटन के आंकड़े भविष्य की चाहत दिखाते। पाकिस्तानी प्रचार पीड़ा व हिंसा बेचता है, वास्तविक जरूरतें नजरअंदाज।