डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ के सिद्धांत पर अमल करते हुए 66 वैश्विक एजेंसियों से अमेरिका को हटा लिया है। जलवायु, स्वास्थ्य और सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्र प्रभावित हुए हैं, जो अमेरिकी करदाताओं के पैसे की बर्बादी को रोकने का प्रयास है।
इनमें संयुक्त राष्ट्र की 31 और गैर-यूएन की 35 संस्थाएं शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इनका संचालन खराब है और ये अमेरिकी प्रगति के खिलाफ हैं। मार्को रूबियो ने बयान में कहा, ‘ये समझौते हमारी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं। ट्रंप अपने वचनों को निभा रहे हैं।’
हम अमेरिका और उसके नागरिकों को सर्वोपरि रखेंगे, रूबियो ने पुष्टि की। भारत-फ्रांस पहल आईएसए, जिसे पीएम मोदी ने 2015 पेरिस में शुरू किया, अब अमेरिका के बिना चलेगा। यूएनएफसीसीसी जैसे प्रमुख जलवायु मंच से भी विदाई हो रही है।
ट्रंप ने 2025 ब्राजील जलवायु सम्मेलन का बहिष्कार किया था। आईपीसीसी को उन्होंने ‘जाल’ कहा है। डब्ल्यूएचओ से अलगाव जनवरी 2025 से प्रक्रिया में है। यह कदम पेरिस समझौते से निकलने की राह तैयार करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक एकजुटता कमजोर होगी, खासकर विकासशील देशों के लिए। अमेरिका के समर्थक इसे साहसिक कदम कहते हैं, जो घरेलू विकास को गति देगा। ट्रंप की यह रणनीति भविष्य की कूटनीति को परिभाषित करेगी।