म्यांमार का सैन्य तानाशाही वाला चुनाव अभियान विवादों में घिर गया है। विश्लेषकों ने इसे ‘पैंटोमाइम’ कहा है – केवल औपचारिकता। तीन चरणों में चल रहे ये मतदान अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए हैं, न कि बदलाव के।
रिपोर्ट बताती है कि चीन स्थिरता चाहता है, पर ये चुनाव निष्पक्ष नहीं। पुलिस की भारी मौजूदगी, प्रेरक संगीत के वीडियो के बावजूद यांगून-मांडले में वोटर अनुपस्थित हैं। 2021 के उछाल से उलट, अब भय का साया है।
तख्तापलट को पांच बरस होने को हैं, जिन्होंने सू ची सरकार उखाड़ फेंकी। संघर्ष, गरीबी और संकट ने देश को तोड़ दिया। एक युवती बोली, ‘वोटिंग या बहिष्कार – दोनों में खतरा।’
जुंटा का फोकस मजबूरी पर, सुधार पर नहीं। पूर्व यूएन विशेषज्ञ ने चेताया – ये सैन्य का सबसे घटिया जुआ, लोकतंत्र को हमेशा बंद रखने का। नतीजे फिक्स्ड हैं।
म्यांमार के लोगों को सच्ची आजादी चाहिए। ये नौटंकी वैधता नहीं देगी, बल्कि जंटा को मजबूत करेगी। दुनिया को साफ बयान देना होगा।