चीन की वैश्विक आर्थिक पहुँच ने दुनिया को चकित कर दिया है। यह अब केवल एक विनिर्माण केंद्र नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा आधिकारिक ऋणदाता बन गया है। पिछले दो दशकों में, बीजिंग ने लगभग 200 देशों को भारी मात्रा में ऋण और निवेश के माध्यम से प्रभावित किया है, जिसमें अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान जैसे देश भी शामिल हैं। यह दर्शाता है कि चीन का वित्तीय प्रभाव कितना व्यापक हो गया है।
डेन वोंग अपनी नई पुस्तक ‘ब्रेकनेक’ में बताते हैं कि चीन की इंजीनियरिंग क्षमता और तीव्र शहरीकरण सिर्फ आर्थिक विकास नहीं, बल्कि अमेरिकी प्रभुत्व के लिए एक गंभीर चुनौती है। वे सवाल करते हैं कि क्या अमेरिका अब चीन की प्रगति से भयभीत है और पीछे छूट जाने की चिंता कर रहा है। एडडेटा रिसर्च लैब की रिपोर्ट के अनुसार, 2000 से 2023 के बीच, चीन ने $2.2 ट्रिलियन वैश्विक स्तर पर वितरित किए, जिससे कई देश कर्ज के बोझ तले दब गए या लाभान्वित हुए।
यह दिलचस्प है कि चीन की ऋण नीति केवल गरीब देशों तक सीमित नहीं है। लगभग 47% ऋण गरीब देशों को दिया गया, लेकिन एक आश्चर्यजनक 43% विकसित और धनी देशों को भी दिया गया। इसका मतलब है कि जहाँ विकासशील देश चीन पर निर्भर हो रहे हैं, वहीं विकसित अर्थव्यवस्थाएँ भी इस पर निर्भरता दिखा रही हैं। इसके अतिरिक्त, केवल 6% से कम धनराशि अनुदान या रियायती ऋण के रूप में दी गई।
एडडेटा के शोध से यह स्पष्ट होता है कि चीन विश्व स्तर पर सबसे प्रमुख आधिकारिक ऋणदाता है। ऋण देने के अलावा, चीनी सरकारी कंपनियाँ विश्व स्तर पर बुनियादी ढाँचे, खनिज, हवाई अड्डों, डेटा सेंटर और यहाँ तक कि टेस्ला, अमेज़ॅन और बोइंग जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों में भी भारी निवेश कर रही हैं।
चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) भले ही चर्चित हो, लेकिन यह चीन के कुल विदेशी ऋण का केवल 20% ही है। बीजिंग का बड़ा निवेश अब उच्च-तकनीकी क्षेत्रों, खासकर सेमीकंडक्टर उद्योग में हो रहा है, जिससे वह भविष्य की तकनीकों पर अपना नियंत्रण मजबूत कर रहा है।
चीन की ऋण देने की रणनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। 2000 में, केवल 11% ऋण विकसित देशों को दिए गए थे, जो 2023 तक बढ़कर 75% हो गए। आज, अमेरिका $202 बिलियन के साथ चीन का सबसे बड़ा कर्जदार है, उसके बाद रूस ($172 बिलियन), ऑस्ट्रेलिया ($130 बिलियन), और वेनेजुएला ($106 बिलियन) हैं। भारत को भी $11.1 बिलियन का ऋण मिला है।
यह स्पष्ट है कि चीन केवल विकासशील देशों की मदद नहीं कर रहा है। वह अपने लक्षित ऋणों और निवेशों के माध्यम से वैश्विक शक्ति संतुलन, राजनीतिक समीकरणों और भविष्य की प्रौद्योगिकी में अपनी भूमिका को मजबूत कर रहा है। चीन अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है।
