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    Home»World»F-35: अमेरिकी फाइटर जेट के बिक्री नियम और भारत के लिए चुनौती
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    F-35: अमेरिकी फाइटर जेट के बिक्री नियम और भारत के लिए चुनौती

    Indian SamacharBy Indian SamacharNovember 21, 20254 Mins Read
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    लॉकहीड मार्टिन का F-35 लाइटनिंग II, दुनिया का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान, अपनी गुप्त तकनीक और बेजोड़ क्षमताओं के कारण लगातार चर्चा में रहता है। हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी अरब को इस शक्तिशाली फाइटर जेट की संभावित बिक्री का संकेत दिया, जिसने वैश्विक रक्षा बाजार में हलचल मचा दी। F-35 की तकनीक इतनी गोपनीय है कि अमेरिका इसे केवल कुछ चुनिंदा और विश्वसनीय सहयोगियों को ही प्रदान करता है, वो भी सख्त शर्तों के तहत।

    F-35 को लेकर अमेरिका की नीतियां काफी कड़े नियमों पर आधारित हैं। यहां तक कि इजरायल जैसे घनिष्ठ सहयोगी को भी इसके उपयोग पर कुछ सीमाएं लागू होती हैं। यह विमान अपनी अभूतपूर्व स्टील्थ क्षमता और बहुस्तरीय सुरक्षा प्रणालियों के लिए जाना जाता है, जिसे अमेरिका किसी भी कीमत पर सुरक्षित रखना चाहता है।

    रूसी S-400 की मौजूदगी, F-35 की बिक्री में बाधा

    एक प्रमुख नियम यह है कि अमेरिका किसी भी ऐसे देश को F-35 नहीं बेचेगा जहां रूसी S-400 वायु रक्षा प्रणाली स्थापित हो। तुर्की ने इस नियम का उल्लंघन करने पर F-35 कार्यक्रम से अपनी भागीदारी खो दी। नाटो सदस्य होने के बावजूद, तुर्की द्वारा S-400 खरीदे जाने पर अमेरिका ने कड़ी कार्रवाई की। आज, तुर्की का $2.5 बिलियन का S-400 सिस्टम अभी भी इस्तेमाल नहीं हुआ है और भंडारण में पड़ा है। यह तुर्की के लिए एक बड़ा आर्थिक और सामरिक नुकसान साबित हुआ है, और अब वह F-35 कार्यक्रम में वापसी की संभावना तलाश रहा है।

    चीनी तकनीक के खतरे से बचाव

    अमेरिका उन देशों को भी F-35 बेचने से बचता है जहां उसे चीनी प्रौद्योगिकी के प्रसार का खतरा महसूस होता है। हुआवेई जैसी चीनी कंपनियों पर निगरानी और डेटा चोरी के आरोपों के कारण अमेरिका और उसके कई सहयोगी देशों ने अपने 5G नेटवर्क में उनके उपकरणों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसी चिंता के कारण, F-35 की बिक्री यूएई जैसे देशों को भी रोकी गई है, और ब्रिटेन जैसे देशों में भी इसकी तैनाती पर सवाल उठे हैं।

    मध्य पूर्व में इजरायल की श्रेष्ठता सर्वोपरि

    अमेरिका की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू मध्य पूर्व में इजरायल की ‘गुणात्मक सैन्य बढ़त’ (qualitative military edge) सुनिश्चित करना है। इसी सिद्धांत के तहत इजरायल को बड़ी संख्या में F-35 लड़ाकू विमान मिले हैं। इस नीति के कारण, कतर, यूएई और मिस्र जैसे देशों को यह उन्नत विमान उपलब्ध नहीं कराया गया है। अब सऊदी अरब की F-35 खरीदने की इच्छा इस क्षेत्र की शक्ति संतुलन में नया मोड़ ला सकती है।

    जासूसी का जोखिम और ताइवान का मुद्दा

    अमेरिका उन देशों को F-35 बेचने से भी हिचकिचाता है जहां विदेशी जासूसी का खतरा अधिक हो। ताइवान, जो चीन द्वारा लगातार जासूसी और घुसपैठ का सामना कर रहा है, इस श्रेणी में आता है। इस जोखिम को देखते हुए, अमेरिका ने ताइवान को F-35 बेचने की मांग पर कोई विचार नहीं किया है।

    ट्रम्प और पेंटागन के बीच मतभेद

    राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा सऊदी अरब को 48 F-35 लड़ाकू विमान बेचने के प्रस्ताव पर पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारी चिंतित हैं। उन्हें डर है कि इससे विमान की संवेदनशील तकनीक चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों के हाथ लग सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब और चीन के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास के दौरान F-35 की तकनीक लीक होने का खतरा बढ़ सकता है।

    F-35: एक महंगा और जटिल सौदा

    F-35 लाइटनिंग II, जिसे लॉकहीड मार्टिन द्वारा बनाया गया है, दुनिया की सबसे महंगी हथियार प्रणालियों में से एक है। इसकी विकास लागत अरबों डॉलर में है और प्रति विमान की कीमत भी बहुत अधिक है। इसके अलावा, इसके संचालन और रखरखाव की लागत भी काफी ज्यादा है। भारत के लिए, F-35 की उच्च कीमत, सीमित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और जटिल रखरखाव की आवश्यकताएं इसे एक चुनौतीपूर्ण खरीद बनाती हैं। फरवरी 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इस पर चर्चा के बावजूद, भारत ने अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है।

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