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    Home»World»चीन की ‘जादुई’ दवा का सच: लाखों गधों की निर्मम हत्या
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    चीन की ‘जादुई’ दवा का सच: लाखों गधों की निर्मम हत्या

    Indian SamacharBy Indian SamacharOctober 24, 20253 Mins Read
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    चीन में पारंपरिक चिकित्सा के नाम पर गधों के साथ अमानवीय व्यवहार का मामला सामने आया है। लाखों गधों को हर साल केवल उनकी खाल के लिए मार दिया जाता है, जिसका इस्तेमाल ‘एजिआओ’ नामक एक लोकप्रिय उत्पाद बनाने में होता है। यह पारंपरिक दवा, जो सदियों से इस्तेमाल की जा रही है, अफ्रीका और पाकिस्तान जैसे देशों से आयातित गधों की खाल से बनाई जाती है। इस खाल को उबालकर एक जेल जैसा पदार्थ निकाला जाता है, जिसे स्वास्थ्य टॉनिक, सौंदर्य उत्पादों, मिठाइयों और पेय पदार्थों में मिलाया जाता है।

    एजिआओ को पारंपरिक चीनी चिकित्सा में एंटी-एजिंग, रक्त संचार बढ़ाने और एनीमिया, नींद न आना, चक्कर आना और यहां तक कि कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज में प्रभावी माना जाता है। 2,500 साल से अधिक पुराने इतिहास वाली यह औषधि, आज चीन के संपन्न मध्यम वर्ग के बीच खासी लोकप्रिय है। उच्च-स्तरीय स्किनकेयर और वेलनेस उत्पादों में इसके इस्तेमाल से इसका बाजार बहुत बड़ा हो गया है। 2013 में जहाँ यह बाजार $3.2 बिलियन का था, वहीं 2021 तक यह $7.8 बिलियन तक पहुँच गया।

    डेली मेल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस उत्पाद के लिए सालाना छह मिलियन से अधिक गधों को बेरहमी से मौत के घाट उतारा जा रहा है। जानवरों को अत्यधिक थक जाने तक घंटों तक चलाया जाता है और वध से पहले क्रूरतापूर्वक पीटा जाता है। उनकी खाल को उतारकर चीन भेजा जाता है, जहाँ इसे औद्योगिक पैमाने पर संसाधित कर ऑनलाइन बेचा जाता है।

    जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ‘ब्रुक’ के डॉ. स्कॉट मिलर ने इस व्यापार की भयावहता को बयां किया है। उन्होंने अफ्रीका में देखी गई स्थितियों को ‘speechless’ बताया, जहाँ गधों को चुराया जा रहा है, भूखा-प्यासा रखा जा रहा है, लंबी दूरी तक चलने को मजबूर किया जा रहा है और बेहद अमानवीय परिस्थितियों में मारा जा रहा है।

    हालांकि अफ्रीकी संघ ने 2024 में गधों की खाल के लिए वध पर प्रतिबंध लगा दिया है, फिर भी चीन की बढ़ती मांग के कारण अवैध कत्लेआम जारी है। पाकिस्तान और कई अफ्रीकी देश इस व्यापार के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं। बोत्सवाना में, 2011 से 2021 के बीच गधों की आबादी में लगभग 70% की भारी गिरावट देखी गई।

    विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि यह क्रूर व्यापार जारी रहा, तो अगले 15 वर्षों में अफ्रीका में गधों की संख्या 27 मिलियन से घटकर मात्र 14 मिलियन रह सकती है। एजिआओ की बढ़ती वैश्विक मांग एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है। यह ‘चमत्कारी’ लगने वाली दवा न केवल एक प्रजाति को विलुप्त होने के कगार पर ले जा रही है, बल्कि इसमें अकल्पनीय पशु क्रूरता छिपी हुई है। लाखों गधे अपनी जान गंवा रहे हैं, और उनका दर्द सदियों पुरानी परंपरा और आधुनिक विलासिता के पीछे छिपा हुआ है। चीन की स्वास्थ्य क्रांति की असली कीमत जानवरों के जीवन से चुकाई जा रही है।

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