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    Home»World»ग़ाज़ा का पुनर्निर्माण: कब और कैसे? उम्मीद की किरण या अधूरी हसरत?
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    ग़ाज़ा का पुनर्निर्माण: कब और कैसे? उम्मीद की किरण या अधूरी हसरत?

    Indian SamacharBy Indian SamacharOctober 9, 20253 Mins Read
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    7 अक्टूबर 2023 की सुबह ने ग़ाज़ा के इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ा। हमास के अप्रत्याशित हमले के बाद, इज़राइल ने जवाबी कार्रवाई में ग़ाज़ा को तबाह कर दिया। इस भीषण संघर्ष ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया और शहर के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।

    आज, दो साल बाद भी, ग़ाज़ा खंडहरों का शहर बना हुआ है। जहां कभी लोगों की भीड़ होती थी, अब सिर्फ सन्नाटा पसरा है। लाखों लोग बेघर हैं, तंबूओं में रहने को मजबूर हैं और अपने खोए हुए जीवन की यादों के सहारे जी रहे हैं। यह सिर्फ इमारतों का ढहना नहीं है, बल्कि लाखों जिंदगियों का उजड़ना है।

    संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, ग़ाज़ा का 80% बुनियादी ढांचा तबाह हो गया है। आर्थिक नुकसान खरबों में है, और 54 मिलियन टन से अधिक मलबा शहर को ढके हुए है। अनुमान है कि इस मलबे को साफ करने में ही एक दशक लग जाएगा, और पूरे पुनर्निर्माण में एक लाख 20 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आ सकता है।

    ग़ाज़ा के पुनर्निर्माण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बातचीत चल रही है। अमेरिका इस महत्वपूर्ण कार्य की कमान संभालने पर विचार कर रहा है, और पूर्व ब्रिटिश प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर को योजना बनाने की ज़िम्मेदारी दी जा सकती है। हालांकि, यह सब अभी भी योजना के चरण में है और ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर है।

    युद्ध का असर सिर्फ इमारतों पर ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर भी पड़ा है। ग़ाज़ा की मिट्टी विस्फोटक अवशेषों से प्रदूषित हो गई है, जिससे कृषि को फिर से शुरू करना एक बड़ी चुनौती बन गई है। उपजाऊ भूमि को फिर से जीवन देने में दशकों लग सकते हैं, जिससे भविष्य में खाद्य सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा बन सकती है।

    बच्चों का भविष्य सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है। युद्ध ने उनके बचपन को छीन लिया है। 90% से ज़्यादा स्कूल और विश्वविद्यालय नष्ट हो चुके हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। हज़ारों बच्चे अनाथ हो गए हैं, जो मलबे के बीच अपने खोए हुए माता-पिता की यादों में जी रहे हैं।

    स्वास्थ्य सेवाएं भी ध्वस्त हो चुकी हैं। 36 अस्पतालों में से अधिकांश क्षतिग्रस्त हैं या बंद हो चुके हैं। बचे हुए अस्पताल बिजली और दवाओं की भारी कमी से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों और नर्सों को मलबे के बीच मरीजों का इलाज करना पड़ रहा है, जहाँ हर पल मौत का इंतज़ार है।

    कुल मिलाकर, 66,000 से ज़्यादा जानें जा चुकी हैं, जिनमें 18,430 बच्चे थे। 39,000 से ज़्यादा बच्चे अपने माता-पिता को खो चुके हैं। यह युद्ध सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि मानवता पर एक गहरा घाव है।

    इन सबके बीच, ग़ाज़ा के लोग अभी भी उम्मीद की किरण तलाश रहे हैं। वे पुनर्निर्माण और बेहतर कल का सपना देख रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ग़ाज़ा अपने खंडहरों से उठकर फिर से खड़ा हो पाएगा? क्या वह शहर, जो अपनी मज़बूती के लिए जाना जाता था, फिर से अपनी पहचान बना पाएगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सिर्फ़ समय ही दे सकता है, लेकिन तब तक, ग़ाज़ा के लोगों के लिए जीना ही एक सबसे बड़ी जंग है।

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