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    Home»World»छोटे राष्ट्रों में सरकारें कैसे गिरती हैं: एक विश्लेषण
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    छोटे राष्ट्रों में सरकारें कैसे गिरती हैं: एक विश्लेषण

    Indian SamacharBy Indian SamacharSeptember 10, 20254 Mins Read
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    नेपाल में, ओली सरकार जनता के गुस्से को शांत करने या उनकी नब्ज टटोलने में नाकाम रही। जनता का असंतोष एक दिन का नहीं था, बल्कि वर्षों से पनप रहा था, बस एक चिंगारी की ज़रूरत थी। 8 सितंबर को हिंसक प्रदर्शन हुए। लोगों ने पुलिस बैरिकेड्स तोड़ दिए और संसद में घुस गए। पुलिस की गोलीबारी और हिंसा में कई लोग मारे गए। गुस्से में भीड़ ने संसद भवन को आग लगा दी और एक पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी की भी हत्या कर दी गई।

    तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अपनी जान बचाकर भाग निकले। उन्होंने कुछ मंत्रियों को हेलीकॉप्टर में बिठाया और काठमांडू से चले गए। वह कहाँ गए, यह अज्ञात है। भ्रष्टाचार में डूबी सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा था। सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से स्थिति और खराब हो गई।

    लोगों का गुस्सा इतना ज़्यादा था कि कई मंत्रियों को पीटा गया। पूर्व प्रधानमंत्री झालानाथ खनाल के घर को आग लगा दी गई। उनकी पत्नी, राजलक्ष्मी चित्रकार, बुरी तरह जल गईं और बाद में अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को भी जनता ने पीटा, और उनकी पत्नी भी घायल हो गईं। वित्त मंत्री विष्णु पौडेल को घर से बाहर निकालकर पीटा गया। केपी शर्मा ओली के घर और राष्ट्रपति के आवास को भी आग लगा दी गई। संसद भवन में लगी आग पर काबू नहीं पाया जा सका, और लूटपाट भी हुई। सिंह दरबार को भी आग लगा दी गई। नेपाल पूरी तरह से विद्रोहियों के नियंत्रण में था। सेना और पुलिस लाचार थीं। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया।

    केपी शर्मा ओली नेपाल को संभालने में नाकाम रहे। प्रदर्शनों के कई कारण थे, जिनमें प्रमुख भ्रष्टाचार था। बार-बार सरकारें बदलीं; पांच वर्षों में तीन प्रधानमंत्री आए। शेर बहादुर देउबा, पुष्पकमल दहल प्रचंड और केपी शर्मा ओली। देउबा को छोड़कर, सभी कम्युनिस्ट थे। वे चीन के साथ नज़दीकी बढ़ा रहे थे, जिसके कारण भारत से दूरी बन गई। लिपुलेख विवाद पर ओली ने भारत को नाराज़ कर दिया, जबकि नेपाली लोगों को भारत में ही सबसे ज़्यादा शरण मिलती है। भारत के साथ विवाद बढ़ाना रोटी-बेटी के रिश्तों को ख़त्म करने जैसा था। इसके अतिरिक्त, तराई क्षेत्र में रहने वाले मधेशी लोगों के साथ नेपाल सरकार का भेदभावपूर्ण व्यवहार रहा।

    इस आंदोलन का नेतृत्व काठमांडू के मेयर, बालेन्द्र शाह उर्फ बालन कर रहे थे। ऐसा माना जाता है कि वह अंतरिम सरकार का नेतृत्व करेंगे। भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट के रूप में नेपाल, अमेरिका के लिए भी फायदेमंद है। ओली सरकार का झुकाव चीन की ओर था। प्रधानमंत्री ओली चीन के समर्थन से भारत और अमेरिका दोनों को चुनौती देने लगे थे। नेपाल सरकार के हर मंत्री ने भ्रष्टाचार किया। भाई-भतीजावाद फैला हुआ था, और मंत्रियों के रिश्तेदारों को ही पद और ठेके मिल रहे थे।

    पिछले चार वर्षों में, भ्रष्टाचार के कारण भारत के पड़ोसी चार देशों की सरकारों का तख्तापलट हुआ: 2021 में अफ़गानिस्तान, 2022 में श्रीलंका, अगस्त 2024 में बांग्लादेश और अब नेपाल। इन सभी देशों में बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार ज़्यादा था। जनता सरकारों से तंग आ चुकी थी। चीन और अमेरिका दोनों इन देशों में शामिल थे। चीन के बारे में कहा जाता है कि वह जिस देश का समर्थन करता है, वहां की सरकार अस्थिर हो जाती है।

    नेपाल की तरह ही 2011 में लीबिया में भी जन आक्रोश देखा गया था। कर्नल गद्दाफ़ी की सरकार को युवाओं ने उखाड़ फेंका। गद्दाफ़ी की दमनकारी नीतियाँ, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से लोग परेशान थे। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया गया।

    छोटे देशों में जहां राजनेताओं की जनता पर पकड़ नहीं होती, वहां सत्ता में बने रहना मुश्किल होता है। भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी का बढ़ना आम बात है। बांग्लादेश में, प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद ने पलायन को रोकने की कोशिश की, लेकिन ठेके उनके परिवार को मिले। इसका फायदा हसीना विरोधी दलों ने उठाया और तख्तापलट करवा दिया।

    तख्तापलट के बाद आने वाली नई सरकारें भी क्रांतिकारी बदलाव नहीं लाती हैं। हसीना के बाद बांग्लादेश में बनी अंतरिम सरकार भ्रष्टाचार को रोकने या जनता के गुस्से को शांत करने में विफल रही। नई सरकार के मुखिया, मोहम्मद यूनुस, अल्पसंख्यकों और धर्मनिरपेक्ष लोगों की रक्षा करने में नाकाम रहे।

    Bangladesh Corruption Geopolitics Government Overthrow Nepal Political Instability Protests Regional Politics Social Media Sri Lanka
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