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    1929 की महामंदी: ट्रंप की चेतावनी और अमेरिका के हालात

    Indian SamacharBy Indian SamacharAugust 9, 20256 Mins Read
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    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन टैरिफ दरों को लागू करने पर जोर दिया है जो कई देशों पर लगाई गई हैं. उनका मानना है कि कोर्ट इस मामले में प्रतिकूल फैसला दे सकता है. ट्रंप ने कोर्ट को आगाह करते हुए कहा कि यदि टैरिफ को लेकर कोई फैसला लिया जाता है, तो अमेरिका 1929 की महामंदी की स्थिति में जा सकता है. आइए जानते हैं कि 1929 की महामंदी क्या थी और उस समय अमेरिका में क्या हालात थे.

    1929 की महामंदी, जिसे ‘द ग्रेट डिप्रेशन’ भी कहा जाता है, में दुनिया के कई हिस्सों में उत्पादन और आय में गिरावट आई, साथ ही व्यापार और रोजगार में भी भारी गिरावट आई. इस मंदी के कारण दुनिया की एक बड़ी आबादी भुखमरी और गरीबी के चंगुल में फंस गई थी. उद्योगों पर भी असर पड़ा और कई उद्योग बंद हो गए, जिससे बड़े उद्योगपति भी कर्जदार हो गए.

    1929 की महामंदी की शुरुआत

    1929 की महामंदी प्रथम विश्व युद्ध के एक दशक बाद शुरू हुई थी, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शक्ति संतुलन को काफी बिगाड़ दिया था, साथ ही वैश्विक वित्तीय प्रणाली को भी गहरा झटका लगा था. युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका और जापान में बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां खुलीं, जिसके कारण उत्पादन बढ़ा. युद्ध के समय जितना उत्पादन हो रहा था, वह युद्ध के बाद भी जारी रहा, जिसके कारण बाजार में माल की अधिकता हो गई और उसे खरीदने वाला कोई नहीं था, जिससे उत्पादकों को भारी नुकसान हुआ.

    कृषि क्षेत्र में गिरावट

    उत्पादन के अलावा कृषि क्षेत्र में भी यही स्थिति बनी. युद्ध खत्म होते-होते कृषि क्षेत्र में सुधार आने लगा और पैदावार काफी बढ़ गई. फसलों की अधिकता की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनाजों की भी कीमत काफी गिर गई, जिससे किसानों को उनकी लागत का पैसा भी नहीं मिला. किसानों ने अपनी आय बनाए रखने के लिए और अधिक पैदावार शुरू कर दिया, जिससे अनाज की कीमतें काफी गिर गईं. खरीदार नहीं मिले और अनाज रखे-रखे खराब होने लगा, जिससे यह वर्ग भी बर्बादी की कगार पर आ गया.

    ‘ब्लैक ट्यूसडे’ और महामंदी की शुरुआत

    अमेरिकी शेयर मार्केट में भारी गिरावट ने दुनिया को महामंदी की ओर धकेल दिया. 24 अक्टूबर, 1929 को न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में लगभग 50% की गिरावट आई, जबकि कॉर्पोरेट मुनाफे में 90% से अधिक की गिरावट देखी गई. इस दिन को “ब्लैक ट्यूसडे” के नाम से जाना गया. हालांकि, अमेरिकी सरकार और पूंजीपतियों की कोशिशों से बाजार में सुधार आया, लेकिन नवंबर में शेयरों की कीमतें फिर से गिरने लगीं, जिससे निवेशकों को भारी नुकसान हुआ.

    अमेरिका ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यूरोप को भारी कर्ज दिया था. अमेरिका में बाजार में उथल-पुथल की आहट सुनाई देने लगी तो अमेरिका ने 1929 में ऐलान कर दिया कि अब वह किसी भी देश को कर्ज नहीं देगा. कर्ज नहीं मिलने से कई देशों पर संकट मंडराने लगा था और यूरोप के बड़े बैंक बर्बाद हो गए थे. ब्रिटेन समेत दुनिया के कई देशों की मुद्राओं की कीमत काफी नीचे गिर गई थी और लैटिन अमेरिका भी इससे अछूता नहीं रहा था.

    मंदी के कारण कर्ज देना बंद

    महामंदी का असर पूरी दुनिया में दिखने लगा था. अमेरिका को सबसे अधिक महामंदी की मार झेलनी पड़ी थी. अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, जर्मनी समेत कई यूरोपीय देश भी इसकी चपेट में आ गए थे. अमेरिका की अर्थव्यवस्था तेजी से नीचे गिर रही थी.

    लगातार मंदी को देखते हुए अमेरिकी बैंकों ने कड़े फैसले लिए और घरेलू स्तर पर कर्ज देना बंद कर दिया. यही नहीं, जिनको कर्ज दिया था, उनसे जबरन वसूल लिया गया. लेकिन डॉलर की कीमतों में लगातार कमी और संकटपूर्ण स्थिति की वजह से किसान और मध्यम वर्ग से लेकर उद्योगपति तक, सभी आर्थिक संकट के जाल में फंस गए थे. कई परिवार अपना कर्ज तक चुका पाने में असमर्थ थे. बैंकों ने इन परिवारों के मकानों और कारों के जरिए वसूली की.

    बैंकों और कंपनियों का बंद होना

    अमेरिका में हर ओर तबाही मची हुई थी. सख्ती के बाद भी बड़ी संख्या में बैंक लोगों से कर्ज वसूल नहीं कर सके. ग्राहकों की ओर जमा पूंजी नहीं लौटा पाने और निवेश से लाभ न मिलने के कारण बैंक दिवालिया हो गए और उन्हें बंद करना पड़ा. इस वजह से अमेरिका की पूरी बैंकिंग प्रणाली भी ध्वस्त हो गई थी. एक आंकड़े के अनुसार, 1929 से 1933 तक 4,000 से ज्यादा बैंक बंद हो गए थे, जबकि इस दौरान करीब 1,10,000 कंपनियां बंद हो गई थीं.

    बैंकों और कंपनियों के बंद होने से लोगों की नौकरी जाने लगी और इससे बेरोजगारी बढ़ गई. लोगों को खाने-पीने की चीजें खरीदने में दिक्कत होने लगी. 1929 में बेरोजगारों की संख्या करीब 16 लाख थी जो 1933 में 25 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.4 करोड़ तक हो गई थी.

    कुपोषण से मौतों में वृद्धि

    रोजगार और उत्पादन कम होने से अमेरिका में भुखमरी बढ़ गई. 1931 में न्यूयॉर्क के अस्पतालों में करीब 100 लोग भूख के कारण मर गए. बहुत लोग कुपोषण से जुड़ी बीमारियों से मारे गए. सही इलाज नहीं होने पर भी लोगों की मौत हो गई. तब न्यूयॉर्क में एक तिहाई बच्चे कुपोषित थे.

    कर्ज में फंसे अमेरिकी लोग बेघर होने लगे थे. 1932 तक 2,50,000 से ज्यादा लोग अपने बंधक यानी मॉर्गेज नहीं छुड़ा पा रहे थे. जो लोग अपने बंधक या किराए का भुगतान करने में नाकाम रहे, उन्हें बेदखल कर दिया गया. ज्यादातर लोग या तो सड़कों पर या पार्क की बेंचों पर सोने को मजबूर हो गए. खाने के लिए कुछ भी खरीदने को लोगों के पास पैसे तक नहीं थे.

    शहरों में झुग्गियां

    हालत यह हो गई कि अमेरिका के कई शहरों के किनारों पर कार्डबोर्ड और नालीदार लोहे की झुग्गियां बसने लग गईं. लोगों ने तत्कालीन राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर से भी नाराजगी जताई. सरकार की ओर से पर्याप्त मदद नहीं मिलने की वजह से लोगों ने इसका नाम हूवरविले रख दिया.

    खाने के लिए गिरफ्तारी

    कहीं पर कोई काम नहीं मिलने या होने की वजह से बड़ी संख्या में पुरुष इधर-उधर घूमने लगे. ये लोग दिनभर घूमते ही रहते, फिर रेल की पटरियों के किनारे या मालगाड़ियों में लगे तंबुओं में रहते थे. हालत यह हो गई थी कि बड़ी संख्या में लोग खुद को जानबूझकर गिरफ्तार करवाते थे ताकि जेल में आराम से रात बिताई जा सके. जेल में रात बिताने का मतलब गर्मी, बिस्तर और खाना मिलना तय था.

    द्वितीय विश्व युद्ध और महामंदी का अंत

    महामंदी का यह दौर कई सालों तक चला. 1939 तक अमेरिका में स्थिति बेहतर होनी शुरू हुई और नारकीय बन चुकी लोगों की जिंदगी में बदलाव आने शुरू हो गए. 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने और इसके विस्तार की वजह से महामंदी का दौर खत्म होने लगा, क्योंकि इसने फैक्टरियों में फिर से उत्पादन को बढ़ावा दिया. महिलाओं को नौकरियां मिलने लगीं, जबकि कई देशों की सेनाओं ने बड़ी संख्या में युवा और बेरोजगार पुरुषों को जंग के लिए भर्ती करना शुरू कर दिया था.

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