36 वर्षों का इंतजार समाप्त हुआ जब फवाद मिर्जा ने एशियाई खेलों में रजत पदक जीते। 1982 के बाद भारत की घुड़सवारी को यह खुशखबरी फवाद ने दी, जो परिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए ओलंपिक तक पहुंचे। उनकी सफलता ने पूरे खेल जगत को झकझोर दिया।
बेंगलुरु में 6 मार्च 1992 को पैदा हुए फवाद का संपर्क पिता डॉ. हसनिन के पेशे से घोड़ों से हुआ। मार्क टॉड के प्रशंसक फवाद ने जर्मनी जाकर विशेष ट्रेनिंग ली और इवेंटिंग में निपुण बने।
जकार्ता में व्यक्तिगत जंपिंग में 26.40 के स्कोर से रजत और टीम में साथियों राकेश कुमार, आशीष मलिक, जितेंद्र सिंह संग 121.30 अंकों वाला रजत। यह उपलब्धि ऐतिहासिक थी, जिसने लंबे सूखे को विराम दिया।
टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफिकेशन ने उन्हें इंद्रजीत लांबा और इम्तियाज अनीस के बाद तीसरा बनाया। प्रदर्शन शानदार रहा, जिससे खेल को नई जान मिली। अर्जुन अवॉर्ड 2019 उनकी मेहनत का पुरस्कार था।
आज फवाद की प्रेरणा से घुड़सवारी में नई पीढ़ी उत्साहित है। उनका सफर दर्शाता है कि मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। भारत का यह सितारा उज्ज्वल भविष्य का संकेत है।