वरुण सिंह भाटी की कहानी हौसले और जज्बे की मिसाल है। 1995 में नोएडा के निवासी वरुण को इन्फैंसी में पोलियो ने घेर लिया, जिससे एक टांग हमेशा के लिए कमजोर हो गई। गलत इलाज ने हालात बिगाड़े, फिर भी घरवालों ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने का हौसला दिया।
खेलों का शौक बचपन से था। बास्केटबॉल पसंद था, मगर ऊंची कूद ने भविष्य संवारा। सामान्य खिलाड़ियों के साथ ट्रेनिंग की। सत्यनारायण के मार्गदर्शन और गोस्पोर्ट्स के पैरा चैंपियंस प्रोग्राम ने T42 में उन्हें सुपरस्टार बनाया।
लंदन पैरालंपिक 2012 के लिए 1.60 मी. कूद से क्वालीफाई, लेकिन कोटा न मिला। 2014 चाइना ओपन गोल्ड। 2016 में एशिया-ओशिनिया स्वर्ण (1.82 मी., रिकॉर्ड), रियो में 1.86 मी. से ब्रॉन्ज। 2017 वर्ल्ड्स ब्रॉन्ज, 2018 एशियन गेम्स सिल्वर।
अर्जुन अवॉर्ड 2018 में मिला। वरुण साबित करते हैं कि कठिनाइयां अवसर बन जाती हैं जब मेहनत और समर्थन साथ हो। उनका सफर पैरा स्पोर्ट्स को नई ऊंचाइयों पर ले जाता है।