दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम से निकली कुश्ती की वह धारा, जिसके जनक हैं सतपाल सिंह। 1 फरवरी 1955 का जन्मदिन मना चुके यह योद्धा खिलाड़ी से कोच बने कुश्ती के साम्राज्य के शिल्पकार। सुशील, योगेश्वर जैसे नाम आज दुनिया में भारत का डंका बजाते हैं, सबके पीछे सतपाल का हाथ।
गुरु हनुमान से दांव-पेंच सिद्ध। 1974 से कॉमनवेल्थ में तीन रजत, एशियाड में कांस्य-रजत-स्वर्ण की हैट्रिक। ओलंपिक 1980 में चुनौती। 16 राष्ट्रीय खिताब, पारंपरिक मुकुट जैसे हिंद केसरी, महाभारत केसरी।
संन्यास के बाद 1988 से कोचिंग का दौर। छत्रसाल कुश्ती का गढ़। उनके शागिर्दों ने ओलंपिक, कॉमनवेल्थ, विश्व चैंपियनशिप जीते। पुरस्कारों की झड़ी: अर्जुन, पद्मश्री, द्रोणाचार्य, पद्मभूषण।
उम्र 70 के पार, लेकिन जोश जवानी जैसा। सतपाल सिंह नए पहलवानों को तैयार कर देश को मजबूत बना रहे हैं, कुश्ती की ज्योति जलाए हुए।