राज्य सरकार और विपक्ष के बीच मणिकर्णिका घाट पर बहस छिड़ी है, लेकिन काशी का सिनेमाई सफर अविरल है। जीवन-मृत्यु का संगम, गंगा तट और जीवंत गलियां फिल्मों को नई उड़ान देती हैं। सैकड़ों शूटिंग्स हो चुकी हैं यहां।
आनंद एल राय की ‘रांझणा’ (2013) बनारस की गलियों में धनुष-सोनम का जुनून उतार लाई। आरती, घाट और बाजारों ने प्रेम को जीवंत कर दिया।
‘मसान’ ने 2015 में विक्की-ऋचा को मणिकर्णिका पर बिठाया। नीरज घायवान की फिल्म ने दुख, प्रेम और समाज को काशी के आईने में दिखाया।
शुभाषिश भूटियानी का ‘मुक्ति भवन’ (2016) घाट किनारे मौत का इंतजार दिखाता है। आदिल हुसैन की कहानी हास्य और भावुकता का अनोखा मेल है।
‘बनारस’ (2006) में उर्मिला का प्रेम आध्यात्मिक रहस्य बना। पंकज पराशर ने काशी विश्वनाथ और आश्रमों से फिल्म सजाई।
‘मोहल्ला अस्सी’ अस्सी के मोहल्लों से सामाजिक मुद्दे उछाली। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने स्थानीय जीवन को बखूबी पकड़ा।
अयान मुखर्जी की ‘ब्रह्मास्त्र’, ‘वनवास’ में नाना पाटेकर का पारिवारिक ड्रामा, और ‘भूल चूक माफ’ की फैंटेसी ने काशी को चमकाया। गंगा किनारे, चौकों पर ये शूट हुईं।
बनारस का हर कोना कहानी कहता है, जो सिनेमा को हमेशा आकर्षित करता रहेगा।