गुजरात की धरती से निकली अपर्णा पोपट ने बैडमिंटन को नया आयाम दिया। पुरुष प्रभुत्व वाले इस खेल में उन्होंने महिलाओं के लिए बाधाओं को तोड़ा और नई राह बनाई।
करियर की शुरुआत जोरदार। 1997 का राष्ट्रीय खिताब और फिर पांच साल की सिंगल्स राज। उनकी रणनीतिक चतुराई और ताकतवर खेल ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
विश्व मंच पर भी जलवा। राष्ट्रमंडल खेलों में दो कांस्य पदक। ऑल इंग्लैंड में क्वार्टरफाइनल—यह उपलब्धि भारतीय महिला बैडमिंटन का टर्निंग पॉइंट बनी। इससे फंडिंग और ध्यान बढ़ा।
सामाजिक कार्य में भी अग्रणी। लड़कियों के लिए कैंप, उपकरण और यात्रा भत्ता सुनिश्चित किया। उनकी वकालत से नीतियां बदलीं। संन्यास के बाद चयनकर्ता और कोच बनीं, नई पीढ़ी को निखारा।
आज ओलंपिक पदक विजेता महिलाएं उनकी मेहनत का फल हैं। अपर्णा पोपट साबित करती हैं कि दृढ़ इच्छा से कुछ भी संभव है। उनकी विरासत बैडमिंटन को और समृद्ध करेगी।