भारतीय क्रिकेट इतिहास में विनोद कांबली वह नाम हैं जिनकी प्रतिभा को सलाम किया जाता है, लेकिन उपलब्धियों को अफसोस से याद। शिवाजी पार्क के हीरो ने रणजी ट्रॉफी में डबल सेंचुरी ठोककर चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भी धमाल मचाया, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया।
डेब्यू से ही कांबली ने प्रतिद्वंद्वियों को रौंदा। न्यूजीलैंड में टेस्ट शतक, शारजाह में वनडे धमाके। उनकी अनोखी बल्लेबाजी – लेग से ऑफ पर चौके – स्टेडियम गूंज उठता। मगर 1994 की चोट ने ब्रेक लगाया। वापसी में फॉर्म लौटा नहीं। 1996 विश्वकप का दर्दनाक क्षण करियर का टर्निंग पॉइंट।
चयन से बाहर होने के बाद घरेलू स्तर पर मेहनत की, लेकिन मौके कम मिले। निजी जीवन में उथल-पुथल बढ़ी। वर्तमान में स्वास्थ्य संकट गहरा – डायलिसिस, व्हीलचेयर। बॉलीवुड और क्रिकेट जगत ने मदद का ऐलान किया। अजहरुद्दीन बोले, ‘गनीमत था।’
90 के दौर की कमियां साफ – फिटनेस पर लापरवाही, साइकोलॉजिकल हेल्प न होना। कांबली स्वयं कहते हैं, ‘गलतियां हुईं।’ उनकी जीवनी युवा खिलाड़ियों के लिए चेतावनी। क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, जीवन का संघर्ष है। फैंस की दुआएं उनके साथ।