पाकिस्तान और आईएमएफ का नाता ‘प्यार-नफरत’ का अनोखा संगम है, जो अब खुली जंग में बदल गया। ‘आतंकिस्तान’ के नाम से मशहूर इस मुल्क की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है।
बैलआउट पैकेज की ताजा किस्त पर ब्रेक लग गया। आईएमएफ ने राजस्व लक्ष्य न पूरा करने पर नाराजगी जताई। 38 फीसदी महंगाई, बेरोजगारी, बिजली संकट—लोग त्रस्त। कर्ज चुकाने का बोझ 20 अरब डॉलर सालाना।
पिछले 60 सालों में 23 प्रोग्राम चले, अरबों डॉलर मिले, लेकिन आदत नहीं सुधरी। राजनीतिक हस्तक्षेप से सुधार ठप। जियोपॉलिटिक्स ने तूल दिया—आतंकी फंडिंग शक। चीन मदद कर रहा, पर आईएमएफ की मुहर जरूरी। चुनाव सर पर, दबाव चरम पर।
विशेषज्ञ चेताते हैं—श्रीलंका जैसा संकट संभव। क्या पाक सुधरेगा या गर्त में जाएगा? यह सवाल अर्थ जगत को बांधे हुए है।