गरीबी की मार झेलते हुए भी मनोज सरकार ने हार नहीं मानी। रैकेट न खरीद पाने वाले इस तीरंदाज ने चुनौतियों को पार कर पैरालंपिक में भारत को मेडल दिलाया।
बंगाल के साधारण परिवार से आए मनोज को बचपन में आर्थिक संकटों ने घेरा। फिर भी तीरंदाजी का जुनून छोड़ा नहीं। असली उपकरण न होने पर भी उन्होंने देसी तरीकों से अभ्यास जारी रखा।
सरकारी योजनाओं और खेल अकादमियों के सहयोग से करियर संवर गया। देश-विदेश में सफलताओं का सिलसिला चला। विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन किया।
टोक्यो पैरालंपिक का सेमीफाइनल यादगार रहा। सटीक निशाने से कांस्य सुनिश्चित किया। इस जीत ने लाखों दिव्यांग बच्चों में जोश भरा।
अब कोचिंग के जरिए नई पीढ़ी तैयार कर रहे मनोज। उनकी मेहनत से प्रेरित होकर भारत पैरा-स्पोर्ट्स में नई ऊंचाइयों को छू रहा है।