हॉकी के दिग्गज रूपिंदर पाल सिंह की जिंदगी एक प्रेरणा पुस्तक है। जिन्हें बचपन में स्टिक और जूतों के लिए मोहताज होना पड़ा, वही आज ओलंपिक नायक हैं।
पंजाब के अमृतसर में पैदा हुए रूपिंदर के घर की हालत ऐसी नहीं थी कि खेल उपकरण आसानी से मिल जाएं। फिर भी, हॉकी के प्रति उनका जुनून देखते ही बनता था। बिना जूतों के प्रैक्टिस, पुरानी स्टिक से खेलना – ये उनकी रोजमर्रा की जिंदगी थी।
भाग्य ने उनका साथ दिया जब कोचों ने उनकी काबिलियत देखी। पंजाब टीम में शामिल होकर वे जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे। ड्रैग फ्लिक में महारथ हासिल कर ली। अंतरराष्ट्रीय करियर में कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स में कई पदक जीते।
टोक्यो ओलंपिक 2020 का कांस्य पदक उनका सर्वोच्च सम्मान। टीम को जीत दिलाने में उनकी भूमिका सराहनीय रही। 200 से ज्यादा मैच खेल चुके रूपिंदर अब युवाओं को ट्रेनिंग दे रहे हैं।
उनकी सफलता बताती है कि मेहनत और लगन से कोई भी ऊंचाई हासिल की जा सकती है। रूपिंदर पाल सिंह जैसी कहानियां भारतीय खेल जगत को नई दिशा देती हैं।