राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने झारखंड के आदिवासी भाइयों के बीच हिंदू धर्म की सच्ची व्याख्या की। शनिवार को आयोजित संवाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म पूजा पद्धति मात्र नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन शैली है जो विविधता को एक सूत्र में बांधती है।
भागवत ने भारत को विविधता में एकता का प्रतीक बताया। भिन्न पूजाएं हों या रीति, सभ्यता मूल एक। वर्षों की चिंतन यात्रा से यही निष्कर्ष- समाज एक होकर आगे बढ़े।
हिंदूत्व का मूल जल-जंगल-कृषि में निहित। वेदों की जड़ें प्रकृति से जुड़ीं। अथर्ववेद धरती मां के माध्यम से सभी भाषाओं, संस्कृतियों का सम्मान दर्शाता है।
जनजातीय नेताओं ने धर्म परिवर्तन, पेसा अधिनियम की खामियां, जनजातीय दर्जा खोने की चिंताएं साझा कीं। भागवत ने आश्वासन दिया- ये राष्ट्र की समस्याएं हैं। पीएम को सूचित कर उपाय करेंगे।
निशा उरांव ने पेसा नियमों पर तीखा प्रहार किया। ‘प्रचलित कानून, धार्मिक-सामाजिक परंपराओं का अभाव। आदिवासी हितों पर चोट।’ 1996 के पेसा कानून को मजबूत बनाने की मांग।
अर्जुन मुंडा, चंपई सोरेन, बाबूलाल मरांडी सहित कई नेता शामिल। भागवत का दो दिवसीय दौरा आदिवासी एकीकरण का प्रतीक बन गया।