दुनिया कितनी भी चमक-दमक वाली हो जाए, होली की असली रौनक तो ‘रंग बरसे’ में ही बसती है। सिलसिला फिल्म का यह गीत ४० साल से ज्यादा पुराना है, लेकिन हर होली पर सबसे आगे रहता है। ‘बलम पिचकारी’ जैसे नए गाने तो ठीक हैं, पर दिल की गहराई तक नहीं उतरते।
रंग, भांग और मस्ती के बीच यह गीत भावनाओं को उजागर करता है। पारिवारिक समारोहों से लेकर सोसायटी पार्टी तक, हर जगह इसकी धुन बजती है। सोशल मीडिया पर इसका जलवा देखिए – इंस्टाग्राम की ३.८ लाख रील्स और यूट्यूब के १७१ मिलियन व्यूज। डर फिल्म के होली ट्रैक्स इसके सामने फीके।
होली अब पहले जैसी नहीं। मोहल्ले की छोटी-मोटी महफिलों की जगह डीजे और बड़ी पार्टियां ले चुकी हैं। इसके बावजूद यह गीत अपनी जगह कायम रखे हुए है। नए वर्जन आते रहे – भोजपुरी से भक्ति गीत तक – मगर मूल की ताजगी ही कुछ और।
राधा-कृष्ण के प्रेम की उमंग इसमें साफ झलकती है। यह सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है। होली २०२५ में भी रंग उड़ेंगे, चेहरे सजेंगे, और सबसे पहले यही पंक्ति गूंजेगी – ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली’। उत्सव की शुरुआत इसी से होगी।