जयपुर की होली में रंगों के साथ एक अनूठी धरोहर जाग उठती है – ‘गुलाल गोटे’। ये लाख की बनी नरम गेंदें हिंदू त्योहार को मुस्लिम हुनर से जोड़ती हैं, जो शहर की स्थापना काल से चली आ रही है।
वजन में हल्की, प्रभाव पर फूटने वाली ये गोटे गुलाल से रंग बिखेरती हैं, बिना चोट पहुंचाए। प्राकृतिक सामग्री से निर्मित, ये त्वचा और पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं।
सवाई जयसिंह के समय से मनिहार मुस्लिम परिवार इस कला में निपुण हैं। उनके इलाके में पीढ़ियां इसे जीवित रखे हुए हैं, सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनाकर।
बनाने का तरीका कठिन: गर्म लाख में हवा फूंककर गोला बनाना, गुलाल भरना और कागज से बंद करना। सावधानी का हर पल साथ निभाता है।
राजसी होली में हाथियों से फेंके जाते थे ये, अब पैलेस उत्सवों में लोकप्रिय। ईको-फ्रेंडली होने से आधुनिक होली के लिए आदर्श।
यह परंपरा जयपुर को भिन्न बनाती है, जहां साझा विरासत रंग भरती है और सद्भाव की मशाल जलाए रखती है।