रंगों के त्योहार होली में जहां हर ओर होलिका दहन की लपटें उठती हैं, वहीं सहारनपुर का बरसी गांव शांत और अनोखा नजारा देता है। यहां न होलिका जलती है, न लकड़ियां जलाई जाती हैं। इसके बजाय पूरे गांव में धुलंडी का उमंग छाया रहता है, रंगों की होली बड़े धूमधाम से खेली जाती है।
इसकी जड़ें महाभारत की गाथाओं में हैं। गांव के पश्चिम मुखी शिव मंदिर में स्थापित स्वयंभू लिंग विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि कौरवों द्वारा निर्मित इस मंदिर को भीम ने युद्धकाल में अपनी गदा से पश्चिम दिशा की ओर मोड़ दिया था। सामान्यतः शिवलिंग पूर्वाभिमुख होते हैं, लेकिन यह अपवाद इसे अत्यंत पवित्र बनाता है।
स्थानीय जनश्रुति कहती है कि होलिका की ज्वाला से शिवजी के पैरों को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए 5000 सालों से यह प्रथा चली आ रही है। ग्रामीण पड़ोसी इलाकों में दहन कर गांव लौटते हैं।
भगवान कृष्ण का भी इस भूमि से गहरा नाता है। महाभारत के बाद उनका आगमन हुआ, जहां उन्होंने इसे ब्रज की भांति शुभ माना और बरसी नाम दिया।
त्योहार के दिन गांव में उल्लास की लहर दौड़ जाती है। गलियों में रंग उड़ते हैं, गुझिया का स्वाद चखा जाता है, भजन गूंजते हैं। बरसी की यह रीत इतिहास, संस्कृति और भक्ति का अनमोल संगम है।