आज 28 फरवरी है, जब 1989 में आधुनिक योग के पितामह तिरुमलाई कृष्णमाचार्य चेन्नई में 100 वर्ष की उम्र में चल बसे। उनकी दूरदृष्टि ने योग को प्राचीन साधना से आधुनिक जीवनोचित पद्धति में बदल दिया, जिसका असर आज पूरी दुनिया में दिखता है।
1888 में कर्नाटक के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे कृष्णमाचार्य ने बचपन से वेद-शास्त्र ग्रहण किए। वाराणसी-पटना में दर्शन, आयुर्वेद सीखा। हिमालयी गुरुकुल में पतंजलि सूत्रों का अभ्यास किया।
मैसूर पैलेस में राजकीय संरक्षण से योग का प्रचार। पुस्तकें, प्रदर्शन और विन्यास शैली से नई क्रांति लाई।
शिष्यों ने अयंगर, विनीयोग जैसी विधाएं गढ़ीं, जो विश्व पटल पर छाईं।
चिकित्सक के रूप में आयुर्वेद-योग संयोजन से असाध्य रोग ठीक किए। भरोसे और अनुशासन पर जोर। योग को मन-प्राण संतुलन का विज्ञान माना।
उनका प्रभाव सीमाहीन। योग आज स्वास्थ्य, थेरेपी का माध्यम है। 100 वर्ष जीना उनकी साधना का फल। इस पुण्यतिथि पर सादर स्मरण।