स्कूल फीस के लिए गलियों में घूमकर सब्जी बेचने वाला लड़का एक दिन राजनीति का चाणक्य बना। नानाजी देशमुख की यह प्रेरक गाथा गरीबी से शिखर तक जाती है। 1916 में परभणी जन्म, तिलक प्रभाव, आरएसएस प्रवेश।
गोरखपुर में संघ प्रचार के लिए गए तो जेब खाली। धर्मशाला से धर्मशाला, आखिर बाबा राघवदास ने शर्त पर जगह दी। रसोइया बनकर 250 शाखाएं स्थापित कीं।
गांधी हत्याकांड बाद प्रतिबंध में नेहरू मंत्रिमंडल के किदवई के घर से काम चलाया। आपातकाल में व्यापारी-सिख भेष में आंदोलन चलाया। पटना में जेपी पर लाठीचार्ज होते ही खुद को ढाल बनाया, हड्डी भंग हुई।
इस बलिदान ने विपक्ष एकजुट किया, 1977 चुनाव जीता। उद्योग मंत्री बनने से इंकार, संन्यास लेकर डीआरआई शुरू किया। एसएसडी से आदिवासी क्षेत्र बदले, विवादमुक्त गांव बनाए।
राष्ट्रपति कलाम ने मॉडल की सराहना की। पद्म विभूषण-भारत रत्न सम्मानित होकर 27 फरवरी 2010 को देह त्यागी। नानाजी का जीवन सेवा का प्रतीक।