श्रीलंका के जंगलों में मौत का खेल खेलते हुए हरदीप सिंह पुरी ने वह इतिहास रचा, जिसने भारत और श्रीलंका के राग-रिश्ते को नई ऊंचाइयां दीं। 1987 में लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण से उनकी गुप्त वार्ता भारत-श्रीलंका करार का आधार बनी। प्रभाकरण की खूंखार प्रतिष्ठा के बावजूद पुरी नहीं डरे।
1952 दिल्ली जन्मे पुरी भारतीय विदेश सेवा के कुशल अफसर थे। गृहयुद्धग्रस्त श्रीलंका में तैनाती के दौरान जाफना मिशन मिला। खदानें, घातें—सब कुछ पार कर नेवी के बीके गुप्ता संग पहुंचे। लिट्टे ने भरोसा न करने पर घुमाया, फिर मुलाकात हुई।
पुरी ने प्रभाकरण को दिल्ली वार्ता का प्रस्ताव रखा। सहयोगी ने कहा, ‘हमारा अमूल्य रत्न चुरा ले जा रहे हो।’ पुरी का आश्वासन काम आया। समझौते के बाद लिट्टे सहमत हुआ, जिससे शांति प्रयास मजबूत हुए।
पुरी ने कम उम्र में ही राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया। कानून पढ़ा, हिंदू कॉलेज में एबीवीपी सक्रिय। भाजपा में 2014 शामिल। शहरी मामले, उड्डयन, वाणिज्य, पेट्रोलियम मंत्रालय संभाले। यूपी राज्यसभा सांसद। उनका साहस आज भी कूटनीति के पाठ पढ़ाता है,两国 संबंधों को सशक्त बनाए रखा।