भारतीय टीवी की धरोहर कविता चौधरी 15 फरवरी को दुनिया छोड़ गईं। कैंसर से जूझते हुए भी उन्होंने गरिमा बनाए रखी। ‘ललिता जी’ के रूप में उन्होंने खरीदारी का फलसफा सिखाया, तो ‘उड़ान’ से बेटियों को उड़ान भरना सिखाया।
एनएसडी के दिनों से सतीश कौशिक उनकी यारबंदी थी। ‘उड़ान’ (1989-91) में उन्होंने उन्हें ही निर्देशक बनाया। बहन कंचन की सच्ची कहानी पर बनी यह कहानी कल्याणी के संघर्ष की थी, जो भ्रष्ट सिस्टम को चुनौती देती है।
परिवार की जमीन गंवाने के बाद कल्याणी का आईपीएस बनना और पिता का ‘बेटियां किसी बेटे से कम नहीं’ कहना जेंडर बहस को हिला गया। इसके बाद यूपीएससी में लड़कियों की संख्या उछली।
सर्फ के ऐड्स में ललिता जी बनकर उन्होंने साबित किया कि महंगा माल बुद्धिमानी है। ‘सस्ती चीज और अच्छी चीज में फर्क’ उनका डायलॉग विज्ञापन इतिहास रच गया। बाद के शो ‘योर ऑनर’, ‘आईपीएस डायरीज’ में भी यथार्थवाद झलका।
दोस्तों के मुताबिक, बीमारी के बावजूद कविता में वही जोश था। उनका निधन दुखद है, मगर उनकी सीखें अमर हैं।