लोकसभा में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी को निशाना बनाते हुए पुराना इतिहास ताजा कर दिया। 1978 में इंदिरा गांधी के निष्कासन का हवाला देते हुए उन्होंने राहुल के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव ला दिया। मांग है कि राहुल की सदस्यता फौरी तौर पर खत्म हो और वे कभी चुनाव न लड़ सकें।
राहुल के भारत-अमेरिका डील पर दिए बयान ने आग लगाई। उन्होंने कहा कि समझौता देशवासियों के हितों से खिलवाड़ है। भाजपा सांसद भड़क गए, बयानों को सदन के लायक न बताते हुए मिटाने की बात कही।
एक्स पर दुबे ने 1978 के रिकॉर्ड दिखाए—आपातकाल में मारुति जांच में बाधा, अधिकारियों पर दबाव के लिए इंदिरा दोषी। 22 नवंबर को प्रस्ताव आया, 19 दिसंबर को पास हो गया। नतीजा—लोकसभा से बेदखली और जेल। 1981 में बहाली हुई।
दुबे ने स्पष्ट किया कि मूल प्रस्ताव स्वतंत्र होता है। बहस-मतदान के बाद फैसला। राहुल पर सदन भ्रमित करने और राष्ट्रविरोधी होने का इल्जाम। निजी प्रस्ताव पेश होने से सरकार पीछे हट गई।
कांग्रेस ने पलटवार किया—यह दबाव की राजनीति है। विपक्ष को नीतियों पर सवाल उठाने का अधिकार। रिजिजू ने दुबे के प्रस्ताव को प्राथमिकता दी।
संसद का माहौल तनावपूर्ण है। यह प्रस्ताव इतिहास रचेगा या भुला दिया जाएगा, देखना दिलचस्प होगा। विशेषाधिकार हनन के ऐसे मामले संसदीय लोकतंत्र की मजबूती की कसौटी हैं।