बांग्लादेश के महत्वपूर्ण चुनावों पर भारत में सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। विभिन्न दलों के नेता लोकतंत्र की रक्षा और अल्पसंख्यकों की चिंताजनक स्थिति पर बोल पड़े हैं। ये विचार पड़ोसी संबंधों को नई दिशा दे सकते हैं।
भाजपा के बालमुकुंदाचार्य ने नई सरकार को बधाई दी, किंतु उग्रवादी खतरों को याद दिलाया। नरेश बंसल ने अल्पसंख्यक अत्याचारों पर रोक लगाने की अपील की। नकवी ने दमनकारी माहौल बदलने का आह्वान किया।
रंधावा ने हिंदू हत्याओं को उजागर किया। वैद ने समावेशी शासन की बात की। शाइना एनसी ने घुसपैठिए खतरे पर चेताया, सत्यापन की मांग की।
भगत ने कट्टरता के खिलाफ साहित्यिक परंपरा का हवाला दिया। सिन्हा ने साझा संस्कृति पर बल दिया। चतुर्वेदी ने हिंसा पर सरकारी मौन को दोषी ठहराया।
शिवदासन ने प्रगतिशील शक्तियों को आशा की किरण बताया। बेढम ने भारत की चेतावनी की सराहना की। बेग ने भावुक राजनीति की निंदा की, तारीगामी ने निष्पक्ष चुनाव चाहा।
कुल मिलाकर, भारतीय नेताओं का संदेश स्पष्ट है—बांग्लादेश को शांति, समानता और लोकतंत्र अपनाना होगा।