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    Home»India»धूमिल: संसद की चुप्पी पर रोटी का सवाल उठाने वाले कवि
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    धूमिल: संसद की चुप्पी पर रोटी का सवाल उठाने वाले कवि

    Indian SamacharBy Indian SamacharFebruary 9, 20261 Min Read
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    साहित्य
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    10 फरवरी 1975 को सुदामा पांडेय उर्फ धूमिल का निधन हुआ। 39 वर्षीय इस कवि ने ब्रेन ट्यूमर के आगे हार मान ली, लेकिन हिंदी साहित्य में उनकी छाप अमिट है। साठोत्तरी दौर के वे सबसे असरदार कवि बने, जिन्होंने कविता को विद्रोह का हथियार बनाया।

    कविता के बदलते परिदृश्य में धूमिल मजदूर की तरह मैदान में उतरे। उनकी पंक्तियां व्यवस्था से भिड़तीं। शब्दों और हथियारों का फर्क वे बखूबी समझते थे। उनका आक्रोश भावुक नहीं, वैचारिक था- शोषणमुक्ति की चाह।

    ‘रोटी बेलने वाला, खाने वाला और खेलने वाला तीसरा- संसद क्यों मौन?’ यह सवाल आज भी गूंजता है। 1936 में वाराणसी ग्रामीण इलाके में जन्म। गरीबी, बाल-विवाह, पिता की असमय मृत्यु, कारखानों की मजदूरी से गुजरे। आईटीआई डिप्लोमा पर अनुदेशक बने।

    राजनीतिक हलचल ने उनकी रचनाओं को ताकत दी। भाषा आम आदमी की, प्रवाहपूर्ण। स्वतंत्रता-पश्चात् भ्रमजाल को चूर किया। ‘संसद से सड़क तक’ जीवनकालीन कृति। मरणोपरांत ‘कल सुनना मुझे’ को अकादमी पुरस्कार।

    धूमिल की कविता सत्ता की नैतिकता को ललकारती है। वर्तमान संघर्षों में उनकी प्रासंगिकता बरकरार है।

    Dhoomil poet Hindi Literature Indian poetry Naxalbari movement Sahitya Akademi Award Satyottari poetry Social critique Sudama Pandey
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