नई दिल्ली में लोकसभा में पूर्व आर्मी चीफ की किताब का हवाला देकर राहुल गांधी के भाषण पर विवादास्पद हंगामा हुआ। सरकार ने किताब के नाम व प्रकाशन पर सवाल ठोंके, सदन ठप। सत्र 끝ने पर राजनीतिक बयानबाजी तेज।
प्रमोद तिवारी ने कांग्रेस नेता राहुल का डटकर साथ दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि राहुल ने राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम पहलू छेड़ा, जो सेना प्रमुख के कलम से निकला। सरकार का चीन समक्ष नतमस्तक होना क्यों? ऊपरी सदन में स्वीकार्य, निचले में वर्जित—राष्ट्रहित की उपेक्षा।
रिजिजू पर तिवारी ने नेहरू के 1959-60 संसदीय खुलासे का जिक्र किया। तब खुली चर्चा हुई, आज नाम लेते ही रोक। न किताब पर बहस, न अभिभाषण पर। जनरल नरवणे की बात पर विमर्श हो। सुरक्षा पर आंच नहीं आएगी। राहुल को सलाम। बाकी साहित्य का हवाला क्यों बेधड़क?
मनीष तिवारी ने परंपराओं का हवाला दिया। 1947 पाक, 1962 चीन युद्ध पर लंबी बहसें। 1965 में राष्ट्रपति की जानकारी। सुरक्षा बहस संसद का कर्तव्य।
भाजपा के मदन राठौड़ ने दिग्विजय के ‘लोकतंत्र खतरे में’ पर कोसा। अनुभवी नेता की ऐसी बेलगामियां? कांग्रेस की इमरजेंसी ने लोकतंत्र मारा। टर्म समाप्ति पर चाटुकारिता।
मयंक नायक ने जनादेश पर भरोसा जताया। भाजपा को जनता ने लोकतंत्र सौंपा। राहुल को स्पीकर ने राष्ट्रभक्ति भंग करने पर टोका।
विपक्ष पारदर्शिता चाहता है, सत्ता संयम बरत रही—विवाद जारी।