दिल्ली के यमुना फ्लडप्लेन पर बसे पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों को बेघर करने की सरकारी कोशिशों पर सुप्रीम कोर्ट ने ब्रेक लगा दिया। अनुसूचित जाति के इन हिंदुओं को नागरिकता मिलने के बावजूद रहने की उचित व्यवस्था न होने पर कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई। मजनू का टीला के सिग्नेचर ब्रिज कैंप में रहने वाले 250 से अधिक परिवार खतरे में थे।
पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न झेलकर ये लोग भारत आए। यहां कई को नागरिकता तो मिल गई, लेकिन पुनर्वास का वादा अधूरा। डीडीए अवैध कब्जे के नाम पर बेदखली की तैयारी कर रहा था, जो दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से मजबूत हुई। शरणार्थियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह ने सुनवाई में केंद्र सरकार व डीडीए को नोटिस ठोक दिए। चार हफ्तों में जवाब मांगा गया और कोई भी हटाने की कार्रवाई पर रोक लगा दी गई। बेंच ने कहा- अनुच्छेद 21 में जीवन की गरिमा आश्रय के बिना अधूरी है। वैकल्पिक आवास क्यों नहीं?
ये लोग दिहाड़ी मजदूरी से पेट पालते हैं। पाकिस्तान की त्रासदी से बचकर यहां पहुंचे, लेकिन बेघर होने का डर अब फिर सताने लगा। यह फैसला अल्पसंख्यक शरणार्थियों के अधिकारों को मजबूत कर सकता है। सरकार को अब ठोस कदम उठाने होंगे।