वाराणसी से उठी संत समाज की हुंकार ने यूजीसी की नई नीतियों को घेर लिया है। ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इन्हें हिंदू एकता के लिए घातक बताया और ‘लड़ो या मरो’ मशीन से उनकी तुलना की। आरोप है कि ये गाइडलाइंस ऊंची जातियों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं तथा सनातन धर्म को खतरे में डाल रही हैं।
शास्त्रीय दृष्टि से स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि जातिप्रथा प्राचीन काल में सामाजिक संतुलन और आजीविका सुरक्षा के लिए बनी थी, न कि संघर्ष के लिए। यूजीसी ने इसे उलट दिया है, जिससे जातीय युद्ध की स्थिति बन रही है। ‘यह सनातन की जड़ों को काटने जैसा है, इन्हें तत्काल वापस लेना होगा,’ उन्होंने कहा।
विरोध की अगुवाई करते हुए उन्होंने सभी हिंदू वर्गों से एकजुट होने का आह्वान किया। सवर्णों का आंदोलन तो शुरू हो गया, लेकिन अन्य समाजों को भी समझना चाहिए कि यह उनकी लड़ाई भी है। समाज का विभाजन हिंदू धर्म के लिए अभिशाप सिद्ध होगा। कानूनी पहलू पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की सीमाओं का जिक्र किया तथा संसद के कानून की सर्वोच्चता पर अमित शाह के बयान का हवाला दिया।
महाराष्ट्र डिप्टी सीएम अजित पवार के प्लेन क्रैश पर स्वामी जी ने साजिश की संभावना जताते हुए निष्पक्ष जांच की जरूरत बताई। ‘जनमानस के संदेह को जांच से ही दूर किया जा सकता है।’
यह घटनाक्रम भारत की सामाजिक नीतियों पर पुनर्विचार की मांग को तेज कर रहा है। स्वामी जी का संदेश हिंदू समाज को नई दिशा दे सकता है।