उत्तर प्रदेश में यूजीसी के ताजा विनियमों के खिलाफ साधु-संतों का गुस्सा भड़क उठा है। प्रयागराज से बरेली तक संत समुदाय इन नियमों को जातिगत टकराव की जड़ बता रहा है और सरकार से इन्हें तत्काल समाप्त करने की मांग कर रहा है।
प्रख्यात संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जन्म से कोई जाति न्यायपूर्ण या अन्यायपूर्ण नहीं होती। सभी में सज्जन और दुर्जन विद्यमान हैं। यूजीसी के इस कदम को उन्होंने हिंदू एकता के लिए घातक बताया। एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ भड़काना पागलपन है, इसे रोका जाए।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह नीति हिंदुओं को आपस में लड़वाकर समाप्त करने की चाल है। सरकार का यह फैसला क्या तर्कसंगत है? क्यों भाईचारे को तोड़ा जा रहा है?
अलंकार अग्निहोत्री के बरेली से इस्तीफे को स्वामी ने सनातन धर्म के प्रति समर्पण का प्रतीक माना। उन्होंने कहा कि उच्च पद त्यागना उस गहन पीड़ा का प्रमाण है जो प्रशासन ने भक्तों के मन में बोई। यह इतिहास में दर्ज रहेगा।
जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने पीएम मोदी को पत्र भेजा है। उन्होंने चरम मांग रखी कि नियम हटें या इच्छामृत्यु की छूट मिले। सामान्य श्रेणी की 35 फीसदी बालिकाओं का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा, अपराधों में इजाफा होगा और योग्य छात्रों को शिक्षा से वंचित होना पड़ेगा।
यह संतों का विद्रोह नीति निर्धारण की कमजोरियों को उजागर करता है। सरकार सामंजस्य बनाए रखे, अन्यथा परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।