19वीं सदी का बंगाल एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। इसी समय महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर ने उभरकर न केवल ब्रह्म समाज को पुनर्जीवित किया बल्कि भारतीय समाज को नई दिशा दी। राजा राममोहन राय के सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में उनकी पहचान बनी।
टैगोर परिवार के इस होनहार युवक ने 1839 में तत्त्वबोधिनी सभा की नींव रखी। राममोहन राय के विचारों को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय उन्हें जाता है। उनका ‘ब्रह्म धर्म ग्रंथ’ में 158 सूत्रों के माध्यम से उन्होंने एक सुसंगत दर्शन प्रस्तुत किया।
मूर्तिपूजा का विरोध, जाति प्रथा का खंडन, स्त्रियों के अधिकारों की वकालत – ये सभी उनके अभियान के केंद्र में थे। उन्होंने बेथून स्कूल जैसी संस्थाओं की स्थापना में सहयोग दिया और विधवाओं के कल्याण के लिए कार्य किया।
महर्षि का व्यक्तिगत जीवन भी प्रेरणादायक था। प्रति भोर अपनी छत पर ध्यान करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। जोरासंको भवन साहित्यकारों और विचारकों का तीर्थ बन गया जहाँ बंकिमचंद्र और रवींद्रनाथ जैसे महानुभावों ने पदार्पण किया।
1866 में आदि ब्रह्म समाज का गठन उनके संरक्षणवाद का प्रमाण था। प्रगतिशील केशवचंद्र सेन के साथ मतभेद के बावजूद उन्होंने अपने मार्ग पर चलना जारी रखा।
महर्षि ने सिद्ध किया कि धार्मिक सुधार हिंसा या विद्रोह से नहीं, बल्कि बुद्धि और नैतिकता से होता है। 1905 में 88 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गारोहण हुआ लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। आधुनिक भारत का आध्यात्मिक आधार वही खड़ा किया।