हरिवंश राय बच्चन—हिंदी के उस शायर जिनके शब्दों में नशा इस कदर घुला है मानो उन्होंने शराब की घुट्टी पी हो। वास्तविकता में वे आजीवन शाकाहारी और शराब से कोसों दूर रहे। 1935 में आई ‘मधुशाला’ पर सवाल उठे—नशा न जाने वाला कवि कैसे इसका चित्रण करेगा? यह विवाद गांधीजी तक पहुंचा और बापू बने साक्षी।
प्रतापगढ़ के छोटे से कस्बे से निकलकर विश्वविख्यात बने बच्चन ने अंग्रेजी में एम.ए. किया। उर्दू शायरी के दीवाने होकर खय्याम की तर्ज पर रुबाइयां रचीं। ‘मधुशाला’ में जीवन को मदिरालय के रूपक से देखा गया—जन्म से मृत्यु तक का सफर।
आलोचकों का तर्क था कि बिना अनुभव के साहित्य असत्य होता है। बच्चन ने पलटकर कहा, कल्पना ही कवि की शक्ति है। साहित्यिक मंचों पर बहसें छिड़ गईं। तत्कालीन नशामुक्ति आंदोलन के दौर में यह संवेदनशील मुद्दा बन गया।
गांधीजी ने एक प्रार्थना सभा में स्पष्ट किया, ‘बच्चन की मधुशाला भौतिक नशे की नहीं, आध्यात्मिक अमृत की बात करती है।’ इस बयान ने विवाद का पटाक्षेप किया। बच्चन को अपार सम्मान मिला।
‘अग्निपथ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’ जैसी रचनाओं से साहित्य को समृद्ध करने वाले बच्चन की विरासत आज भी प्रासंगिक है। उनकी कविताएं नई पीढ़ी को प्रेरित करती रहेंगी।