कथक के बादशाह पंडित बिरजू महाराज की यादें ताज़ा करती हैं वह पल जब उनके घुँघरुओं ने मंच को रेलवे स्टेशन बना दिया। ट्रेन की हर आवाज़ को नृत्य से उकेरते हुए उन्होंने साबित कर दिया कि कला की कोई सीमा नहीं।
लखनऊ घराने की विरासत लिए महाराज का सफर मुश्किलों भरा था। पिता के असामयिक निधन ने उन्हें कम उम्र में ही मंच पर उतार दिया। लेकिन उनकी अभिनया और ताल की महारत ने उन्हें पद्म श्री से पद्म विभूषण तक पहुँचा दिया।
ट्रेन सीक्वेंस में गत भावों का ऐसा जादू बिखेरा कि दर्शक स्तब्ध रह गए। इंजन स्टार्ट से लेकर स्टेशन पहुँचने तक, हर मोमेंट नृत्य में साकार हुआ। घुँघरू कथक की जीभ बन गए, कहानियाँ सुना गए।
बॉलीवुड में ‘मोहे पंघट पे’ जैसी रचनाएँ हो या अंतरराष्ट्रीय मंच, हर जगह उनकी छाप रही। उन्होंने शोवना नारायण जैसे शिष्यों को तैयार किया और कथक को नया आयाम दिया।
बिरजू महाराज का योगदान अमिट है। उनकी ट्रेन आज भी कथक की पटरी पर दौड़ रही है, नई पीढ़ी को प्रेरित करती हुई।