सपने देखना आसान, उन्हें साकार करना कठिन। बॉलीवुड की ‘गुरु’ और ‘बैंड बाजा बारात’ यही साबित करती हैं। जोखिम भरी उद्यमी यात्राओं को रोमांचक ढंग से पेश करती ये फिल्में लाखों को प्रेरित करती हैं।
मणि रत्नम की ‘गुरु’ में गुरुकांत का संघर्ष गांव से मुंबई तक फैला है। जूट व्यापार से शुरू कर टेक्सटाइल साम्राज्य खड़ा करना, प्रतिद्वंद्वियों को मात देना—फिल्म वास्तविकता से प्रेरित है। नौकरशाही और नैतिक दुविधाओं का चित्रण गहरा है।
वहीं ‘बैंड बाजा बारात’ दिल्ली की शादी इंडस्ट्री में घुसपैठ दिखाती है। बिट्टू-श्रुति की जोड़ी कैपिटल के बिना ‘शादी मुबारक’ चलाती है। वेंडर्स, बजट और रिश्तों की उलझनें सुलझाते हुए वे एम्पायर बनाते हैं।
आज जब स्टार्टअप्स 1 लाख को पार कर चुके, ये फिल्में सबक देती हैं—जोखिम लो, सीखो, जीतो। ‘बदमाश कंपनी’ फ्रॉड की चेतावनी देती है।
बॉलीवुड की ये गाथाएं भारत के आर्थिक उड़ान को पंख देती हैं। युवा उद्यमी इन्हें देखें और आगे बढ़ें।